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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 190 of 442

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Page 190

१९२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
एक क्षण में महान वायु जिस तरह से मेघों को हटा देता है और विनष्ट
कर दिया करता है वैसे ही महान बल के रखने वाले सभी वाराह के
गणों को मार दिया था। उस सब वाराह के वीर गणों के निहित हो
जाने पर वराह ने चिन्तन किया था कि वह क्या पहले और पीछे ऐसा
वृत्त उपस्थित हुआ है। उसके उपरान्त चिन्तन करते हुए उसके हृदय में
भगवान जनार्दन ने गमन करके वह सभी कुछ वाराह वपु के हित को
विज्ञापित कर दिया था। इसके अनन्तर उस समय में देह का परित्याग
करने के लिए महान बलशाली ने नरसिंह को दाढ़ों के अग्रभाग के
घातों से विभक्त कर दिया था। शरभ भगवान भर्ग ने मध्य में दो भागों
में कर दिया था। नरसिंह के दो भागों में विभक्त होने पर उसके नर
भाग से नर ही समुत्पन्न हुआ था जो दिव्य रूपशाली महान ऋषि था।
उसके पाँच मुखों के भाग से नारायण श्रुत हुआ था।
वह महान तेज वाले महामुनि जनार्दन हो गये थे। नर और
नारायण दोनों महती मति वाले इस दृष्टि के हेतु हो गये थे। उन दोनों
का प्रभाव बहुत ही दुर्धर्ष था और शास्त्र में, वेद में और तपों में सब
उनका प्रभाव सहन करने के योग्य नहीं था। मत्स्य मूर्ति रक्षक के
स्वरूप वाली नौका में उन दोनों को निर्धारित किया था और फिर
वाराह हरि देव शरभ के समीप में प्राप्त हुए थे। मुझे समस्त जगतों के
हित के सम्पादन करने के लिए वपु का त्याग अवश्य ही करना
चाहिए। यह पूर्व में मैंने प्रतिज्ञा की थी उसी के लिए यह समुद्यम किया
जा रहा है। वह समुद्यम भगवान हरि के द्वारा, शम्भु के द्वारा और ब्रह्म
के द्वारा किया जा रहा है। ऐसा भली-भाँति चिन्तन करके उस समय
में परमेश्वर शूकर के शरभ महान बलवान देव महादेव से कहा था-हे
महादेव! आप मुझे परित्याग कर दो। मैं बिना किसी संशय के इस
शरीर का त्याग करूँगा। यह मेरे शरीर का ज्ञात समस्त जगतों के और
देवों के तथा ऋत्विजों के हित के सम्पादन करने के ही लिए हैं। मेरे
देह के प्रतीकों के समूहों से यज्ञ का यूप प्रकल्पित करके, हे महाभागे!
पृथक-पृथक शामित्र के सहित स्रुवा आदि की कल्पना की है।