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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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२० श्रीकालिका पुराण
परिग्रह करेंगे उस समय में वे ही स्वयं तुम्हारे शरीर को प्राप्त करा देंगे ।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने कामदेव से
इतने ही वचन कहकर मानस पुत्र समस्त मुनीन्द्रों के देखते हुए वे
अन्तर्हित हो गए थे । सबके विधाता उन ब्रह्माजी के अन्तर्धान हो जाने
पर भगवान् शम्भु भी वायु के समान वेग से अपने अभीष्ट देश को
चले गए थे । उन ब्रह्माजी के अन्तर्हित हो जाने पर भगवान् शम्भु के
भी अपने स्थान पर चले जाने के पश्चात् प्रजापति दक्ष उसकी पत्नी
को निदर्शित करते हुए कामदेव से बोले-हे कामदेव! यह मेरे देह से
समुत्पन्न हुई मेरे ही रूप और गुणों से समन्वित है यह आपके ही सदृश
गुणों से युक्त है सो अब तुम इसको अपनी भार्या बनाने के लिए ग्रहण
कर लो । यह महान् तेज से युक्त सर्वदा आपके ही साथ चरण चलने
वाली और इच्छानुसार धर्म से वश में वर्त्तन करने वाली होगी ।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-दक्ष प्रजापति ने यह कहकर अपनी देह
के पसीने से उत्पन्न हुई पुत्री को कामदेव के लिए उसके आगे करके
दे दिया था और उसका नाम 'रति' यह कहकर ही प्रदान किया था ।
कामदेव भी उस परम सुन्दरी रति नाम वाली वराँगना को देखकर उस
रति में अत्यधिक अनुरक्त होकर अपने ही बाण के द्वारा विद्ध होकर
मोह को प्राप्त हो गया था । क्षणमात्र में होने वाली प्रभा के ही समान
वह एकान्त गौरी और मृगी के समान लोचनों वाली तथा चंचल उपांगों
से समन्वित मृगी की भाँति उसके ही तुल्य परम शोभित हुई थी । उस
रति की दोनों भौंहों को देखकर कामदेव ने संशय किया था कि क्या
विधाता ने मुझे उन्माद वाला बनाने के लिए यह कोदण्ड (धनुष)
निवेशित किया है । हे द्विजोत्तमो ! उस रति के कटाक्षों की शीघ्र गमन
करने वाली गति को देखकर अर्थात् शीघ्र ही हृदय को बिद्ध कर देने
वाली चाल को देखते हुए उसे अपने अस्त्रों की शीघ्रगामिता और
सुन्दरता पर श्रद्धा नहीं रह गयी थी । तात्पर्य यही है कि उसके (रति
के) कटाक्षों की गति के सामने अपने बाणों की गति कामदेव को तुच्छ
प्रतीत होने लग गयी थी । उस रति की स्वाभाविक रूप से सुगन्धित