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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 20 of 442

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§००२ श्रीकालिका पुराण १००३ २१
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धीर श्वासों की वायु का आघ्राण करके कामदेव ने मलय पर्वत की
गन्ध को लाने वाली वायु में श्रद्धा का त्याग कर दिया था । कथन का
अभिप्राय यह है कि मलय मारुत भी उसके श्वासानिल के समाने हेय
प्रतीत हो रही थी । पूर्णचन्द्र के समान भौंहों के चिह्न से लक्षित उसके
मुख को देखकर कामदेव ने उसके मुख और चन्द्र में किसी प्रकार के
भेद का निश्चय नहीं किया था । उस रति के दोनों स्तनों का जोड़ा
सुनहरी कमल की कलिका के जोड़े के ही समान था । उन स्तनों के
ऊपर जो कृष्ण वर्ण से युक्त चूचक थे (काली घुंडियाँ) वे ऐसी प्रतीत
हो रही थीं मानों कमल की कलिकाओं पर भ्रमर बैठे हुए रसपान कर
रहे हों ।
अत्यन्त दृढ़ (कठोर) पीन (स्थूल) और उन्नत स्तनों के मध्य भाग
से नीचे की ओर जाती हुई नाभि पर्यन्त रहने वाली, तन्वी सुन्दर,
आयत और शुभ रोमों की पंक्ति को कामदेव ने भ्रमरों की पंक्ति से
संम्भृत (संयुत) पुष्प धनुष की ज्या (डोरी) को भी विस्मृत कर दिया
था क्योंकि उसका ग्रहण करके इसको ही देखता है । पुनः उसके ही
सुन्दर स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उसकी गम्भीर नाभि के
रन्ध्र (छिद्र) के अन्दर चारों ओर त्वचा से वह आवृत थी । उसके मुख
कमल पर जो दो नेत्रों को जोड़ा था वह ऐसी प्रतीत होता था मानों
थोड़ी लालिमा से युक्त कमल हों । हे द्विज श्रेष्ठों ! जिसका मध्य भाग
क्षीण था ऐसे शरीर से वह रति निसर्ग अष्टपद की प्रभा वाली थी ।
उसको कामदेव ने रत्नों द्वारा विरचित वेदी के ही समान देखा था ।
उसके ऊरुओं का युगल अत्यन्त कोमल और कदली के स्तम्भ के समान
आयत एवं स्निग्ध (चिकना) था । कामदेव ने उसको अपनी शक्ति के
ही तुल्य मनोहर देखा था । थोड़ी रक्तिमा से युक्त पार्ष्णि पादाग्र प्रान्त
भाग से संयुक्त दोनों पदों के जोड़े को कामदेव ने उसमें स्थित अनुराग
से परिपूर्ण चित्र देखा था । उस रति के दोनों हाथों को जो ढाक के
पुष्पों के समान लाल नाखूनों से युक्त थे और परम सूक्ष्म सुवृत्त
अंगुलियों को परम मनोहर देखा था ।