कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १८५
चाहिए। भगवान् वासुदेव ने भी उन सब देवगणों को विदा करके
वाराह के तेज का आहरण करने के लिए वे फिर ध्यान में परायण हो
गए थे। जब धीरे-धीरे माधव प्रभु उस तेज का अपहरण करते हैं तो
उस समय में वह वाराह का देह सत्व से हीन हो गया था। जब सभी
देवों ने उस देह को तेज से हीन समझ लिया था उसी समय में देव
अद्भुत यज्ञ वाराह के समीप में प्राप्त हुए थे। ब्रह्मा आदि समस्त देव
उमा के स्वामी महोदव के समीप में गये थे कि उस समय में उस तेज
को कामदेव के शासन करने के लिए अधीन करें। फिर इसके अनन्तर
सभी देवों के समुदाय ने अपना-अपना तेज भगवान् वृषभध्वज में
समायोजित कर दिया था उससे वे भगवान् शम्भु बहुत ही अधिक
बलवान हो गये थे।
इसके अनन्तर शरभ के वाले रूप उसी क्षण में गिरीश हो गये थे।
वे ऊपर और नीचे के भाग से आठों पादों से युक्त अत्यन्त भैरव हो
गये। वह वाराह का शरीर दो लाख योजन ऊँचाई वाला था और डेढ़
लाख योजन के विस्तार से युक्त था। ऊपर की ओर वह वाराह का
शरीर एक लाख योजन के विस्तार वाला था। आधा लाख योजन
पार्श्व में विस्तृत था। उस समय में ऐसा वह वाराह शरीर वर्तमान हो
गया था। इसके अनन्तर उस यज्ञ पौत्री ने शिर पर चन्द्र का स्पर्श करने
वाले शरभ के रूप वाले उमापति महादेव का दर्शन किया था। उनका
स्वरूप लम्बी नाक, और नखों वाला था तथा काले अंगार के समान
प्रभा से युक्त था। उनका मुख दीर्घ था, महान् शरीर से समन्वित था
और उसमें आठ दाढ़ें थीं, जटायें धारण करने वाली पूँछ थी तथा लम्बे
कानों वाला परमाधिक भयानक स्वरूप था। उसके चार पद पृष्ठ भाग
में थे तथा चार अधर में थे। वह महान् घोर शब्द कर रहे थे तथा
बारम्बार उछाल खा रहे थे। इसके अनन्तर आगमन करते हुए उनको
देखकर तो तुरन्त ही क्रोध से दौड़ लगा रहे थे। सुवृत्त, कनक और घोर
वहाँ पर क्रोध से मूर्छित होते हुए प्राप्त हो गये थे।
फिर वे तीनों भाई महान शरीरधारी शरभ के समीप में आ गये थे