कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextऋतुओं का एक वत्सर (वर्ष) होता है। और उनको आप पृथक्-पृथक
सुनिये। हे द्विजोत्तमो ! संज्ञा के भेद से चैत्र आदि दो मासों से ऋतु को
समझिए। चैत्र और वैशाख दो मास में बसन्त ऋतु होता है। ज्येष्ठ
और आषाढ़ दो मास में ग्रीष्म ऋतु हुआ करता है। श्रावण और भाद्रपद
इन दो मासों में वर्षा ऋतु हुआ करता है। आश्विन और कार्तिक मासों
में शरद् हुआ करता है। अगहन और पौष में हेमन्त ऋतु हाता है तथा
माघ और फाल्गुन मासों में शिशिर ऋतु होता है। ये छै ऋतुये कही गई
हैं जो यज्ञादि में पृथक विहित किये गये हैं। मनुष्यों के मान से सत्रह
क्षय है और अट्ठाईस सहस्त्र का मान कृतयुग का है। अन्तराल में
अर्थात युगों के मध्य में चार सौ वर्षों का सन्ध्याकाल होता है।
सन्ध्यांश उतने से ही कहा गया है जो अन्तर्गत ईक्षित होता है।
त्रेता युग मनुष्य के बारह लक्ष वर्षों का हुआ करता है और इस
युग की सन्ध्या का समय छियानवे हजार तीन सौ वर्षों का हुआ करता
है। उसके अन्दर तीन सौ सन्ध्यांश कहा गया है। प्रमाण से चौंसठ
हजार लक्ष और आठ वर्ष का द्वापर का नाम वाला युग होता है उनमें
दो सौ की सन्ध्या होती है। दो वर्ष का सन्ध्यांश अन्तर्गत ही अभीष्ट
हुआ करता है। चार लाख बत्तीस हजार वर्ष कलियुग का समय होता
है। वर्षों का मान होता है और एक सौ वर्ष की सन्ध्या का काल होता
है। इसके अनन्तर में एक-एक सौ वर्ष का सन्ध्यांश है। इस रीति से
कृतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग मानुषमाण से चार युग हुआ करता
हैं। ये चारों युग सैंतालीस लाख वर्षों के मान से हुआ करता है। बीस
सहस्त्र वर्षों की इन सबकी सन्ध्या का अंश हुआ करता है जो कि उस
सन्ध्यांश से संयुत है।
रात्रियों के सहित देवों का दिन मनुष्यों का एक वत्सर होता है।
इस प्रकार से क्रम की गणना करके मनुष्यों के चारों युगों से देवों के
बारह सहस्त्र वर्ष कीर्त्तित किये गए हैं। देवों के बारह सहस्त्र वर्षों का
दैविक युग हुआ करता है। वह मनुष्यों के चार युग हैं जिसमें सन्ध्या
और सन्ध्याँश भी सम्मिलित होता है। देवों के कृतयुग में त्रेता, द्वापर