कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextएक क्षण तक कुछ भी ब्रह्माजी ने नहीं कहा था। इसके अनन्तर
ब्रह्माजी ने अपने मन को सुसंयमित करके और विस्मय का परित्याग
करके उसके कर्म के उद्देश्य को आवाहन करते हुए उस पुरुष से कहा
था। ब्रह्माजी ने कहा-इस सुन्दर रूप और पाँच पुष्पों के बाणों द्वारा
पुरुषों तथा स्त्रियों को मोहित करते हुए तुम सनातनी सृष्टि का सृजन
करो। न तो देव, न गन्धर्व, न किन्नर और महोरग, न असुर, न दैत्य,
न विद्याधर और न राक्षस, न यक्ष, न पिशाच, न भूत, न विनायक,
न गुह्यक अथवा न सिद्ध, न मनुष्य तथा पक्षीगण ये सब तेरे शर के
लक्ष्य नहीं होंगे। जो भी पशु, मृग, कीट, पतंग और जल में उत्पन्न होने
वाले जीव हैं वे सभी जो कि तेरे शर के लक्ष्य होते हैं वे लक्ष्य नहीं
होंगे। मैं अथवा वासुदेव स्थाणु अथवा पुरुषोत्तम ये सभी तेरे वश में
हो जायेंगे। अन्य प्राणीधारियों की तो बात ही क्या है। तुम प्रच्छन्न रूप
वाला होकर सदा जन्तुओं के हृदय में प्रवेश करते हुए स्वयं सुख को
हेतु बनकर सनातनी सृष्टि की रचना करो। सदा ही तेरे पुष्पों के बाण
का वह मन मुख्य लक्ष्य होगा। आप सभी प्राणियों के लिए नित्य ही
मद और मोद के करने वाले बनो। यही तुम्हारे लिए कर्म मैंने कर दिया
है जो कि पुनः सृष्टि करने का प्रवर्तक है। अब मैं आपका नाम भी
बतलाऊँगा जो कि आपके योग्य ही होगा। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके
अनन्तर यही कहकर सुरश्रेष्ठ मानसों के मुखों का अवलोकन करके
क्षण भर में ही अपने पद्मासन पर उपविष्ट हो गये।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर उनके अभिप्राय के ज्ञान
रखने वाले सब मुनिगण उस समय में उचित मरीच अत्रि प्रमुखों में नाम
रखा था। सृष्टि के सृजन करने वाले दक्ष प्रभृति ने मुख के अवलोकन
से ही अन्य सारे वृत्तान्त का ज्ञान प्राप्त करके उन्होंने स्थान और पत्नियों
को दे दिया था। ऋषियों ने कहा-तुम हमारे विधाता के चित्त का
प्रमथन करके समुत्पन्न हुए हो अतएव तुम मन्थन नाम से ही लोक में
विख्यात होओगे। जगती में तुम कामरूप हो और ऐसा तुम्हारे समान
अन्य कोई भी नहीं है। अतएव हे मनोभव ! तुम काम नाम से भी जाने