Skip to content
SarvaKosh
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 12 of 442

Read in context
Page 12

௵ श्रीकालिका पुराण ௵ १३
विनिःसृत हो गया था।
वह पुरुष सुवर्ण के चूर्ण के समान पीली आभा से संयुक्त था,
परिपुष्ट उसका वक्ष स्थल था, सुन्दर नासिका थी, सुन्दर सुडौल ऊरु
जंघाओं वाला था, नील वेष्टित केशर वाला था, उसकी दोनों भौंहें
जुड़ी हुई थीं, चंचल और पूर्ण चन्द्र के सदृश मुख से समन्वित था।
कपाट के तुल्य विशाल हृदय पर रोमावली से शोभित था शुभ्र मातंग
की सूँड़ के समान पीन तथा विस्तृत बाहुओं से संयुक्त था, रक्त हाथ,
लोचन, मुख, पाद और करों से उपद्रव वाला था। उस पुरुष का मध्य
भाग क्षीण अर्थात् कृश था, सुन्दर दन्तावली थी वह हाथी के सदृश
कन्धरा से समन्वित था। विकसित कमल के दलों के समान उनके नेत्र
थे तथा केशर घ्राण से तर्पण था, कम्बु के समान ग्रीवा से युक्त, मीन
के केतु वाला प्राँश और मकर वाहन था। पाँच पुरुषों के आयुधों
वाला, वेगयुक्त और पुष्पों के धनुष से विभूषित था। कटाक्षों के पात
के द्वारा दोनों नेत्रों को भ्रमित करता हुआ परम कान्त था। सुगन्धित
वायु से भ्रान्त और शृंगार रस से सेवित इस प्रकार के उस पुरुष को
देखकर वे सब मानस पुत्र जिनमें दक्ष प्रजापति प्रमुख थे, विस्मय से
आविष्ट मन वाले होते हुए अत्यधिक उत्सुकता को प्राप्त हुए थे और
मन विकार को प्राप्त हो गया था। वह पुरुष भी जगतों के प्रति और
सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्माजी का अवलोकन करने को विनम्रता
से नीचे की ओर अपनी कन्धरा को झुकाकर प्रणिपात करते हुए
बोला।
पुरुष ने कहा-हे ब्रह्मन् ! मैं अब क्या करूँ ? जो भी आप कराना
चाहते हो उसी कर्म से मुझे नियोजित कीजिए। हे विधे ! वह कर्म
न्यायोचित होवे जिसके करने से शोभा होती है। हे लोकों के ईश!
क्योंकि आप तो जगतों के सृजन करने वाले हैं। अतएव जो भी योग्य
अभिधाम हो, स्थान हो और जो मेरी स्त्री हो, वही मेरे लिए दीजिए।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-उस महान् आत्मा वाले पुरुष के इस रीति
वाले वचन का श्रवण करके अपनी ही सृष्टि से अत्यन्त विस्मित होकर