कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १५
जाओ। मदन करने से तुम मदन नाम वाले भी हो और दर्प से शम्भू
भगवान् के कंदर्प हो इसलिए तुम लोक में कन्दर्प नाम से भी प्रसिद्ध
होओगे। तुम्हारे बाणों का जो पराक्रम है, ब्रह्मास्त्रों का भी उस प्रकार
का नहीं होगा।
स्वर्ग में, मृत्युलोक में, पाताल में और सनातन ब्रह्मलोक में तुम्हारे
सभी स्थान हैं क्योंकि आप सर्वव्यापी हैं। यह दक्ष आपको पत्नी को
स्वयं ही देगा जो कि परम शोभना है। हे पुरुषोत्तम! जो यह आदि में
होने वाला यथेष्ट प्रजापति है और यह कन्या ब्रह्माजी के मन से
समुत्पन्न शमरूपा है जो सन्ध्या नाम से सभी लोक में विख्यात होगी।
क्योंकि ध्यान करते हुए ब्रह्मा जी से भली-भाँति यह वरांगना समुत्पन्न
हुई है इसलिए इस लोक में 'सन्ध्या' इस नाम से इसकी ख्याति होगी।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे द्विजोत्तमो ! यह कहकर सब मुनिगण चुप
होकर संस्थित हो गये थे। उन्होंने ब्रह्माजी के मुख का अवेक्षण किया
और उनके ही समक्ष में विनय से अवनत होकर स्थित हो गए थे।
इसके अनन्तर कामदेव भी कुसुमों से उद्भूत अपने दण्ड (धनुष) को
ग्रहण करके कान्ता के भुवों के सदृश वेल्लित वह धनुष था तथा वह
उन्मादन, इस नाम से विख्यात हो गया था।
हे द्विजोत्तमो ! उसने उसी भाँति पाँचों कुसुमों से विनिर्मित अस्त्रों
को ग्रहण किया था जिनके निम्नांकित नाम हैं-हर्षण, रोचन, मोहन,
शोषण और मरण। इन संज्ञा वाले वे बाण या अस्त्र हैं जो मुनियों के
भी मन में मोह उत्पन्न कर देने वाले हैं। उस कामदेव ने जो कि प्रच्छन्न
स्वरूप से संयुत था वहीं पर निश्चय के विषय में सोचने लगा था।
यहां पर मुनिगण संस्थित हैं तथा स्वयं प्रजापति भी हैं। वे सब आज
मेरे शरव्य भूत होंगे, यह निश्चित है। मैं भगवान् विष्णु और योगिराज
भगवान् शम्भु भी तुम्हारे अस्त्रों के वशवर्ती होंगे। अन्य साधारण
जन्तुओं की तो बात ही क्या है, ऐसा जो कहा था मैं सार्थक करूँ।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-कामदेव ने यह मन से सोचकर और
निश्चय करके पुष्पों के धनुष की पुष्पों की ज्या (धनुष की डोरी)