कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context१२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
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भौंहों के मध्य भाग से नीचे और निम्न भाग से विस्तृत और उन्नत
नासिका थी जो मानों ललाट से तिल के पुण्य के ही समान लावण्य
को द्रवित कर रही थी। उनका मुख रक्तकमल की आभा वाला और
पूर्ण चन्द्र के तुल्य प्रभा से समन्वित था जो बिम्ब फल के सदृश अधरों
की अरुणिमाओं और मनोहर शोभित हो रहा था। सौ सूर्य के समान
और लावण्य के गुणों से परिपूर्ण मुख था। दोनों ओर से चिबुक
(थोड़ी) के समीप पहुँचने के लिए उसके दोनों कुच मानों समुद्यत हो
रहे थे। हे विप्रगणों ! उस सन्ध्या देवी के दोनों स्तवन राजीव (कमल)
की कालिका के समान आकार वाले थे, पीन और उत्तुङ्ग निरन्तर रहने
वाले थे। उन कुचों के मुख श्याम वर्ण के थे जो कि मुनियों के हृदय
को भी मोहित करने वाले थे। सभी लोगों ने कामदेव की शक्ति के
तुल्य ही उस सन्ध्या के मध्यभाग को देखा था जिसमें वलियाँ पड़ रही
थीं तथा मध्य भाग ऐसा क्षीण था जैसे मुट्ठी में ग्रहण करने के योग्य
रेशमी वस्त्र था।
उनके दोनों ऊरुओं का जोड़ा ऐसा शोभायमान हो रहा था जो
ऊर्ध्वभाग में स्थूल था और करभ के सदृश विस्तृत था और थोड़ा
झुका हुआ हाथी की सूँड़ के समान था। जो अँगुलियों के दल से
संकुल कुसुमायुध अर्थात् कामदेव के तुल्य ही दिखलाई दे रहा था।
उस सुन्दर दर्शन वाली, शरीर की रोमावली से आवृत मुख पर, जिसके
पसीने की बूँदें झलक रही थीं, जो दीर्घ नयनों वाली, चारुहास से
समन्वित, तन्वी अर्थात् कृश मध्य भाग वाली जिसके दोनों कान परम
सुन्दर थे, तीन स्थलों में गम्भीरता से युक्त तथा छः स्थानों से उन्नत
उसको देखकर विधाता उठकर हृद्गत को चिन्तन करने लगे थे। वे
सृजन करने वाले दक्ष प्रजापति मानस पुत्र मरीचि आदि सब उस
परवर्णिनी को देखकर समत्सुक होकर चिन्तन करने लगे थे। इस सृष्टि
में इसका क्या कर्म होगा अथवा यह किसकी वर-वर्णिनी होगी। यही
वे सभी बड़ी ही उत्सुकता से सोचने लगे थे। हे मुनि सत्तमो ! इस तरह
से चिन्तन करते हुए उन ब्रह्माजी के मन से वल्गु पुरुष आविर्भूत होकर