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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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Page 117

११८ ௵ श्रीकालिका पुराण ௵
उस समय प्रजापति दक्ष चन्द्र के समीप में पहुँचकर यह वचन
उन्होंने चन्द्रदेव से कहा था कि अपनी भार्याओं में समानता का ही
व्यवहार करिए तथा उनके प्रति जो भी कुछ विषमता की भावना होवे
उसका आप अब परित्याग कर दीजिए। यदि आप हमारे वचनों को
मूर्खता से नहीं समझते हैं तो हे निशापते! मैं धर्मशास्त्र के अतिक्रमण
करने वाले आपके लिए शाप दे दूंगा। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके
अनन्तर चन्द्रदेव ने उस प्रजापति के सामने वैसा ही करने के लिए
स्वीकार किया था क्योंकि उनको दक्ष से अत्यधिक भय था। 'इसी
प्रकार से किया जायेगा। ऐसा पुनः स्वीकार कर लिया था। फिर
अपनी भार्याओं में विषय में समान ही व्यवहार करने के लिए चन्द्र के
द्वारा अंगीकार किये जाने पर दक्ष चन्द्र से सहमत होकर अपने स्थान
को चले गये थे। दक्ष के गमन करने पर निशानाथ चन्द्र फिर
अत्यधिक रूप से रोहिणी के ही साथ में रमण करता हुआ उसने उस
प्रजापति दक्ष के वचन को भुला ही दिया था कि मैं सब भार्याओं में
एक सा व्यवहार करूँगा। वे अश्विनी आदि सभी मनोरम उनकी सेवा
करने वाली हुई थीं किन्तु चन्द्र ने उनका कभी सेवन नहीं किया था
और वह केवल उन सबकी अवज्ञा ही किया करता था। वे चन्द्रदेव
के द्वारा अवज्ञासंयुक्त होकर अपने पिता से यह बोली थीं।
उन्होंने कहा था कि हे मुनिश्रेष्ठ! आपके वचन को भी सोमदेव ने
नहीं किया है और वह तो अब पहले से भी अधिक हमारे विषय में
अवज्ञा किया करते हैं। सोम के द्वारा हमारे विषय में जो भी करना
चाहिए वह कुछ भी नहीं होता है। अतएव अब हम तो सब तपस्विनी
हो जायेंगी। आप हमको वही निर्देश कीजिए। तपस्या के द्वारा अपनी
आत्माओं का शोधन करके हम अपना जीवन ही त्याग देंगी। हे
द्विजोत्तमो! आप ही विचार कीजिए कि ऐसी दुर्भाग्यशालिनी हमको
जीवन रखने से क्या लाभ है। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-फिर यह इतना
कहकर वे सभी कृत्तिका प्रभृति दक्ष की पुत्रियाँ अपने करों से कपोलों
का आलम्बन करके विवश होती हुई भूमि पर रूदन करने वाली थीं।