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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ११
वे परमात्मा व्यक्त और अव्यक्त सत् स्वरूप वाले हैं-वहीं व्यक्ति के
रूप से समन्वित हैं। उनका स्वरूप स्थूल है और सूक्ष्म रूप वाला भी
है, वे विश्व के स्वरूप वाले वेधा हैं, वे परमेश नित्य हैं और उनका
स्वरूप नित्य है तथा उनका ज्ञान भी नित्य है। उनका तेज निर्विकार है।
वे विद्या और अविद्या के स्वरूप वाले हैं, ऐसे कालरूप उन परमात्मा
के लिए नमस्कार है। परमेश्वर निर्मल हैं, विरागी हैं, व्यापी और
विश्वरूप वाले हैं तथा सृष्टि (सृजन) स्थिति (पालन) और अन्त
(संहार) के करने वाले हैं, उनके लिए प्रणाम है।
जिसका योगियों के द्वारा चिन्तन किया जाता है, योगीजन वेदान्त
पर्यन्त चिन्तन करने वाले हैं, जो अन्तर में परम ज्योति के स्वरूप हैं
उन परमेश प्रभु के लिए प्रणाम करता हूँ। लोकों के पितामह भगवान्
ब्रह्माजी ने उनकी आराधना करके समस्त सुर-असुर और नर आदि की
प्रजा का सृजन किया था। उन ब्रह्माजी से दक्ष जिनमें प्रमुख थे ऐसे
प्रजापतियों का सृजन करके मरीचि, अत्रि, पुलह, अंगिरस, ऋतु,
पुलस्त्य, वशिष्ठ, नारद, प्रचेतस, भृगु-इन सब दश मानस पुत्रों का
उन्होंने सृजन किया था। उसी समय में उनके मानस से सुन्दर रूप वाली
वरांगनाओं की समुत्पत्ति हुई थी। वह नाम से सन्ध्या विख्यात हुई थी,
उसका सायं-सन्ध्या का यजन किया करते हैं। उस जैसी अन्य कोई भी
दूसरी वरांगना देवलोक, मर्त्यलोक और रसातल में भी नहीं हुई थी।
ऐसी समस्त गुण-गणों की शोभा से सम्पन्न तीनों कालों में भी नहीं हुई
है और न होगी। वह स्वाभाविक सुन्दर और नीले केशों के भार से
शोभित होती है। हे द्विज श्रेष्ठों! वह वर्षा ऋतु में मोरनी की भाँति
विचित्र केशों के भार से शोभाशालिनी थी। आरक्त और मलिक तथा
कर्णों पर्यन्त अलकों से इन्द्र के धनुष और बाल चन्द्र के सदृश
शोभायमान थी। विकसित नीलकमल के समान श्याम वर्ण से संयुक्त
दोनों नेत्र चकित हिरनी के समान चंचल और शोभित हो रहे थे। हे
द्विज श्रेष्ठों ! कानों तक फैली हुई स्वाभाविक चंचलता से संयुक्त परम
सुन्दर दोनों भौहें थीं जो कामदेव के धनुष के सदृश नील थीं। दोनों