कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context११० ६०२ श्रीकालिका पुराण ६०२
अर्थात् कठिन कष्टप्रद तप का समाचरण करके मर्यादा की स्थापना
करके ही इसके पश्चात् अपने जीवन का त्याग करूँगी । जिस मेरे
शरीर में मेरे पिता ब्रह्माजी ने अपने मन को अभिलाषा से समन्वित
स्वयं किया था जब उस शरीर से भाइयों के साथ कुछ प्रयोजन भी
नहीं है । जिस अपने शरीर के द्वारा सहज स्वीय तात में काम का भाव
उद्भावित कर दिया गया था वह शरीर कभी सुकृत की साधना करने
वाला नहीं है । इस प्रकार से संध्या मन के द्वारा भली-भाँति चिन्तन
करके वह परम श्रेष्ठ पर्वत पर चली गयी थी जो चन्द्रभाग नाम वाला
था और जिससे चन्द्रभाग नाम वाली नदी निकली थी । सवर्ण समान
और समुदित चन्द्र से जिस रीति से उदयपर्वत निरन्तर शोभित हुआ था
ठीक उसी भाँति उस संध्या के द्वारा वह पर्वत उस समय समाधिष्ठित
हुआ और शोभित हुआ ।
चन्द्रमा को शाप का वर्णन
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर उस श्रेष्ठ पर्वत की ओर
गमन की गयी संध्या को देखकर जो कि तपश्चर्या करने के लिए नियत
आत्मावाली थी, ब्रह्माजी ने अपने सुत से कहा था । वह पुत्र वशिष्ठ
मुनि थे । वशिष्ठ संशित आत्मावाले, सब कुछ ज्ञान रखने वाले,
ज्ञानयोगी, समीप में ही सुसमासीन और वेदों तथा वेदों के अंग शास्त्रों
में पारगामी थे । ब्रह्माजी ने कहा-हे वशिष्ठ! आप जाइए जहाँ पर
मनस्विनी सन्ध्या ने गमन किया है। वह संध्या तपस्या करने के लिए
इच्छा रखने वाली हैं । आप जाकर इसको विधि के अनुसार दीक्षा
दीजिए । पहले यहाँ पर कामुकों को देखकर उसको लज्जा हो गयी
थी । हे मुनिश्रेष्ठ! उसने आपको, मुझको और अपने आपको सकाम ही
देखा था अर्थात् सभी के अन्दर कामवासना का अवलोकन किया था ।
पूर्व में होने वाले आयुक्त रूप ने संयुत कर्म को विचार करके वह
हमारे और अपने भी प्राणों का भली-भाँति परित्याग करने की इच्छा
करती है । इस प्रकार से जो मर्यादा से रहित पुरुष हैं उनमें वह