कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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शरीर का त्याग करके पीछे अरुन्धती नाम वाली हुई थीं। वह
मेधातिथि की पुत्री होकर वह सती ब्रह्मा, विष्णु और महेश के वचन
से सच चरित्र व्रत वाली मुनियों में श्रेष्ठ की सती हुई थी। उसने ही संशित
व्रतों वाले महात्मा वशिष्ठ का पति के स्वरूप में वरण किया था
अर्थात् स्वयं ही वशिष्ठ को अपना पति बनाना स्वीकार किया था।
ऋषियों ने कहा-उस संध्या ने किस प्रयोजन की सिद्धि के लिए
कहाँ पर किस प्रकार से तप किया था? फिर क्यों अपने शरीर का
परित्याग किया था और वह कैसे मेधातिथि की पुत्री होकर समुत्पन्न हुई
थी ? कैसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश देवों के द्वारा कहे हुए परम संशित
वाले सुन्दर महात्मा वशिष्ठ मुनि को उसने पति के स्थान में वरण
किया था ? हे द्विजोत्तम! इस चरित्र को श्रवण करने की इच्छा वाले
हमको यह सब विस्तार के साथ कहने की कृपा कीजिए। महासती
अरुन्धती देवी के चरित्र के सुनने के लिए हमारे हृदय में बड़ा भारी
कौतूहल हो रहा है। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-ब्रह्माजी ने भी पहले
अपनी पुत्री सन्ध्या को देखकर कामवासना के लिए अपना मन किया
था और फिर सुता का त्याग कर दिया था। काम के उस प्रकार के
भाव को जो मुनियों के हृदय में भी मोह के करने वाला है वहाँ पर
उसको सन्ध्या ने स्वयं ही देखा था। तब वह परम दुःखिता होकर
लज्जा को प्राप्त हो गई थी अर्थात् स्वयं ही लज्जा आ गई थी।
इसके अनन्तर ब्रह्माजी के द्वारा कामदेव को शाप दे देने पर तथा
विधाता के अन्तर्धान हो जाने पर और भगवान् शम्भु के अपने स्थान
पर चले जाने पर वह मनस्विनी सन्ध्या एक क्षण पर्यन्त शीघ्र ही पूर्व
में होने वाले वृत्त का ध्यान करती हुई वह सन्ध्या परायण हो गई थी।
इस महापाप का प्रायश्चित मैं स्वयं ही करूंगी और वेद मार्ग के
अनुसार अपने आपको अग्नि में हवन कर दूँगी अर्थात् अग्नि में
जलकर अपने प्राणों का परित्याग कर दूँगी। इस भूमण्डल में मैं एक
प्रकार की मर्यादा की स्थापना करूँगी कि जिससे उत्पन्न होते ही
शरीरधारी कामदेव से युक्त न होवे। इसी के लिए मैं परमाधिक दारुण