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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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बना डाला, यही इसमें जामन लग गया तब इस समष्टि जीवने सातोंका विस्तार किया। वे सात वस्तु कौनसी हैं इन्हें अगिले वचनमें बताते हैं ॥ ३ ॥

दूजे घट इच्छा भई, चित्त मन सातों कीन्ह ॥

सात रूपनि रमाइया, अविगत काहु न चीन्ह ॥ ४ ॥

घट-जीव समष्टिमें, दूजे-सुरति होनेके बाद, इच्छा-में एक हूँ, अनेक हो जाऊं यह इच्छा, भई-होगई। इसके बाद, चित्त-चित्त, मन-मन तथा बुद्धि-अहंकार, मैंही ब्रह्म हूँ यह अनुभव और जीव ये, सातों-सात, कीन्ह-किये। सात रूपनि-इन्हीं सातों रूपोंमें, रमाइया-सब रम गये, काहु-किसीने भी, अविगत-नहीं जाननेवाला समर्थ, न-नहीं, चीन्ह-जाना।

जीव समष्टिको सुरति मिलनेके बाद अनेक होनेकी इच्छा हुई। इसके बाद उसे क्रमशः चित्त, मन बुद्धि, अहंकार और मैं ब्रह्म हूँ यह अनुभव हुआ। तथा उसीसे जीव भी हो गया ॥ ४ ॥

तब समरथके श्रवणते, मूलसुरति भइ सार ॥

शब्द कला ताते भई, पाँच ब्रह्म अनुहार ॥ ५ ॥

तब—उसके बाद, समरथके—भगवान् राम के, श्रवणते—रामनाम सुननेके कारण, यही, मूल सुरति—राम नामकी सुरति, सार (मुख्य रूप), भइ-हुई। ताते—इसी राम शब्दसे पाँच-पाँच, ब्रह्म-ब्रह्मोंके, अनुसार-अनुकूल, शब्दकला-शब्दके टुकड़ोंसे नाम, भई-हुए।

चैतन्यता देनेके बाद समष्टि जीवसे कहा कि, राम नामको जपिके मुझे पहिचान ले, मेरे हंसोंमें हो जानेके बाद मैं तुझे अपने लोकमें बुला लूंगा पर समष्टि जीवने इसका विपरीत अर्थ समझा उसके असली अर्थ छोड़कर र् का परा १ आद्या शक्ति, अ का ओम् २ अक्षर, आ का ३ नारायण, ४ म् का संकर्षण, आदि पुरुष, विराट्, हिरण्यगर्भ और अ का-५ महाविष्णु मतलब निकाल लिया एवम् इसका वास्तविक र्-जानकी, र-राम, आ-भरत, म्-लक्ष्मण और अ-शत्रुघ्न तथा रं का-हंस अर्थ होता है यह न समझ सका। तथा उसकी बुद्धिमें यही आया कि, मेरे किये अर्थ असली अर्थके अंश मात्र हैं अंशी नहीं हैं ॥ ५ ॥

पाँचौ पाँचें अंड धारे, एक एकमा कीन्ह ॥

दुइ इच्छा तहें गुप्त हैं, सो सुकृत चित चीन्ह ॥ ६ ॥

पाँच-पाँच, अण्ड-स्वरूप, धरि-बनाकर, एक एकमा—एक एकमें, एक एक करके, पाँच-पाँचौ ब्रह्म, कीन्ह-कर दिये। तहें-तहां, दुइ-दो, इच्छा-