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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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एक तो कारणरूपा इच्छा जो समष्टि जीवमें सुरत देनेसे पहिले थी जिसने कि, इसे जगत् मुख किया । दूसरी वह इच्छा जिससे कि, सुरति पाकर अनुभव ब्रह्म खड़ा किया यही माया परा शक्ति है इस प्रकार ये दो इच्छाएं हैं ये, गुप्त-छिपी हुई, हैं-हैं । कृत-हे धर्मदास । सो उन्हें, चित-दिलमें, चीन्ह-जान लो ।

पांचों ब्रह्मोंके लिये पांच स्वरूप तयार करके एक २ को एक २ में स्थापित कर दिया उसमें दो इच्छाएं गुप्त हैं हे धर्मदास ! तुम उन्हें जानलो । संकर्षण, परा योगमाया, शब्द ब्रह्म, नारायण और महा विष्णु ये पांच ब्रह्म हैं इनमें उक्त दोनों इच्छाएं छिपी हुई हैं ॥ ६ ॥

योगमाया यकु 'कारण, ऊजे अक्षर कीन्ह ॥

या अविगति समरथ करी, ताहि गुप्त करि दीन्ह ॥ ८७ ॥

योग माया-एक तो योग माया, और यकु-एक, कारणे-एक कारण जगत्मुख करनेवाली इच्छा ये दो इच्छाएं हैं । ऊजे-उन्होंनेही, अक्षर-ब्रह्म, कीन्ह-किया, अविगति-समझने न पानेवाले, समरथ-समर्थ श्री रामचन्द्रजीने, या-यह, करी-किया, ताहि-उस इच्छाको, गुप्त-तिरोहित, करि-कर, दीन्ह-दिया ।

एक तो परा आद्यायोगमाया तथा दूसरी कारणरूपा इच्छा है जिसके कारण समष्टिजीव संसारी बनता है इन्होंनेसे उक्त पांचों ब्रह्म बने हैं । भगवान् रामने इन इच्छाओंको गुप्त कर दिया है । इस कारण ये भी नहीं समझ पाये ॥७॥

शवासा सोहं ऊपजे, कीन अमी बंधान ॥

आठ अंश निरमाइया, चीन्हौ सन्त सुजान ॥ ८ ॥

सोहम्-अनुभव गम्य ब्रह्म मैं हूं यह, शवासा-समष्टिजीव आदि पुरुषके श्वाससेही, ऊपजे-उत्पन्न होता है इसीने, अमी-अमृत जैसे प्यारा लगनेवाली वस्तुका, बन्धन-बन्धान, कीन- किया । उसके आठ अंश-आठ भाग निरमाइया-बनाये, सुजान-हैं परमबुद्धिमान्, सन्त-महापुरुषो, चीन्हो-पहिचानो ।

समष्टिजीव आदि पुरुष हिरण्य गर्भके श्वाससे सोहंकी उत्पत्ति होती है इसीने मीठी वस्तुका बन्धन कर दिया कि, इनके बन्धनमें लोग बन्धे रहें उसके अणिमा आदिक आठ भेद किये । ए सत्य सुजानो ! यह जान लो इनके बखेंडेमें मत पड़ो । ये आठों सिद्धियां योगशास्त्रमें प्रसिद्ध हैं । ये बड़ी सिद्धियां थोड़ेही समयमें नष्ट हो जाती हैं ॥ ८ ॥