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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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पहिले, आप-सभोंके गुरु, समरथ-सर्वेश्वर सत्य पुरुष ही रहे-थे । सत्य पुरुष अथवा उसके पूर्वोक्त प्रकाशके सिवा, दूजा-दूसरा, कोई-कोई, न-नहीं, रहा-था । दूजा पूर्वोक्त समष्टि जीव, केहि-किस, विधि-तरहसे, ऊपजा-संसारी हुआ । गुरु-हे गुरुजी महाराज ! सोइ-वही, मैं पूछत हूँ-पूछता हूँ ।

यानी सत्यपुरुष भगवान् रामका लोक और वहांके पार्श्व आदि निवासी भगवान् रामही हैं उनसे भिन्न नहीं हैं, उनके लोकका जो प्रकाश चैतन्याकाशमें है वही समष्टि जीव है । यह किसी तरह भिन्न तथा व किसी तरह एक है । धर्मदासजीका कबीर साहिबसे यही प्रश्न है कि, भगवान्का ऐसा प्रकाश यह जीव संसारी कैसे होगया यह मुझे बताइये । वेदान्तकी दृष्टिसे तात्पर्य-सृष्टि रचनाके पहिले एक अद्वितीय सत्यपुरुषही था ये सब जीव उपकरण रहित पड़े थे, नामरूपात्मक जगत् नहीं था यह संसार कैसे उत्पन्न हुआ मैं आपसे यही पूछता हूँ ॥ १ ॥

तब सतगुरु मुख बोलिया, सुकृत सुनो सुजान ॥

आदि अन्तकी परिचै, तोसों कहौं बखान ॥ २ ॥

तब-शिष्यका प्रश्न सुनकर, सतगुरु-सच्चे गुरु कबीर साहिब मुख-मुंहसे, बोलिया-बोले कि, सुजान-ऐ परम बुद्धिमान्, सुकृत-संस्कारी-जीव धर्मदास, सुनो-सुन लो । मैं तोसों-तुमसे, आदि-संसारी नाना जीव होनेसे पहिलेकी और अन्तकी, सबसे पीछेकी, पारचै-परखी हुई बात, कहौं-कहता हूँ ।

कबीर साहिबने धर्मदासजीका प्रश्न सुनकर बताना आरम्भ किया कि, आदिमें क्या था और कैसे संसारी हुआ किस तरह इसका उद्धार हो सकता है यह सब मैं तुम्हें सुनाये देता हूँ तुम सावधानीके साथ सुन लो ॥ १ ॥

प्रथम सुरति समरथ कियो, घटमें सहज उचार ॥

ताते जामन दीनिया, सात करी विस्तार ॥ ३ ॥

समरथ—भगवान् रामचन्द्रजीने, प्रथम-पहिले, समष्टि जीवको अचेत पड़ा देखकर उनके कल्याणके लिये, घटमें-जीवके भीतर, सुरति-चैतन्यताका, सहज-अपने आपही, उच्चार-संचार, कियो-कर दिया, ताते इस सुरतिके कारणही, जामन-जीवपना जमानेवाली वस्तु, दीनिया-दे दी, इसके बाद जीवने, सात-इच्छा आदिक सातका, विस्तार-फैलाव, करी-दिया ।

अपने अंशरूप जीवोंकी दशा देखकर उनके उद्धारके लिये भगवान्ने उन्हें चैतन्यता दे दी साधन तो उद्धारका था पर इसने अपनेको संसारका पथिक