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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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जाति स्मर था. अपने अन्धे होनेके बारेमें कहा करता कि, मैं दक्षिण भारतमें एक अच्छी रियासतका दीवान था राजाको राजनीतिकी शिक्षा देता था, बिना राजा-जाके कोई काम न करता था। एक दिन एक बलात्कारका अपराधी आया-राजाके पूछने पर मैंने कहा कि, उसे आँखोंसे अन्धा कर दो. वो पापी अन्धाकर दिया गया. उसी दिनसे मैं अन्धा हो गया हूँ क्योंकि, ऐसा दण्ड अनुचित था।

एक बार वो तीन दिनतक गायब रहा चौथे दिन प्रकट होनेपर उसने कहा कि, मुझे विष्णुके पारषद विष्णुलोक को लिये जाते थे मैंने पूछा कि, कहाँ लिये जाते, हो तो उत्तर मिला कि, वैकुण्ठ लिये जाते हैं, मैंने अपने घरवालोंसे मिलनेकी इच्छा प्रगट की दूतोंने मुझे सवासन जानकर लौटा दिया।

इस घटनाके बाद वो ब्राह्मण तीन माह और जीवित रहा पीछे वैकुण्ठ चला गया।

इस प्रकरणके लिखनेका मेरा यही अभिप्राय है कि, जो लोग पशु पक्षी आदिको अर्किचित्कर मानते हुये अपने मनुष्य होनेपर इतराते हैं। वे जान लें कि. जो बातें उनमें हैं वो जानवरोंमें भी पाई जाती है। सबमें इश्वरीय बातें समान हैं जो काम मनुष्य देहसे करते हैं वेही काम पशु पशुतनसे कर लेते हैं आकृतियाँ जुदी २ हैं बस्तु एकही है सबमें आत्मा है तथा परमात्माकी दृष्टिमें सब समान हैं।

दूसरा मेरा यह भी प्रयोजन है कि, जो लोग आवागमनको न मानकर अनेकों पापोंमें लगे हुये हैं, वे जानलें कि, वे कर्मवश हैं जैसे कम्मेंने मानवीशरीर प्रस्तुत कर दिया है उसी तरह कीड़ा मकोड़ा भी बना देगा इसमें कयामत आदिकी आवश्यकता नहीं है केवल कर्मही कारण है. यदि लोगोंने मेरे लेखसे लाभ उठाया तो मैं मेरे भ्रमको सफल होऊँगा जो अपनेको आवागमनके फन्देसे बचावेगा वही श्रेष्ठ है नहीं तो आवागमनके फन्देमें फसे रहनेवाले सभी समान हैं।

अध्याय २०.

अथ आदि मंगल।

दोहा— प्रथमै समरथ आप रहे, दूजा रहा न कोइ ॥

दूजा केहि विधि ऊपजा, पूछत हौं गुरु सोइ ॥ १ ॥

आदि मंगलका अर्थ।

धर्मदासजी कबीर साहिबसे पूछते हैं कि, प्रथमै-चैतन्याकाशमें पड़े हुये साहिबके लोकके प्रकाश स्वरूप जो समष्टि जीव हैं। उनके संसारी बननेके