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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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जंगम कर सकता है वो स्थावरोंको जंगमोंकेसे गुण देता है सब उसके हाथ है वो मनुष्यको पशु तथा पशुको मनुष्य बना सकता है ।

पहाड़से ऊँटिनी—कुरानमें लिखा है कि, किसी जातिके लोगोंने साले-दनबीकी सिद्धि देखनी चाही नबीने उनसे कहा कि, खुदा चाहे तो पहाड़से ऊँटिनी पैदा कर दे, उसी समय पहाड़से ऊँटिनी उत्पन्न हुई उसी समय उसने बच्चे दिये । होते ही वे बराबरके हो गये ये सब बाबुलके पास बहुत दिनों तक चरते फिरे थे ।

यह अपनी शक्तिमात्रसे सबकी रक्षा कर सकता है, उसकी शक्तिका कोई ठिकाना नहीं है उसी शक्तिसे सबकी समभावसे रक्षा करता है ।

उपसंहार—अनन्त ब्रह्माण्ड हैं, उसमें अनन्त प्रकार की उत्पत्ति है, उत्पत्तिके अनन्त प्रकारके रूप और स्वभाव हैं उसका हाल किसीको मालूम नहीं। केवल ब्रह्मज्ञानी लोग जानते हैं, दूसरा कोई नहीं जान सकता । केवल ब्रह्मज्ञानी वहाँ पहुँच सकते हैं ब्रह्मज्ञानीही एक पलमें करोड़ों योजन उड़ जाते हैं, अपनी सामर्थ्यसे दूसरे को भी अपने साथ ले जा सकते हैं । ब्रह्मज्ञानी जिसकी सहायता करते हैं उसका काम पूरा कर देते हैं । ब्रह्मज्ञानी सब कौतुक देख दिखला सकते हैं जैसा कि, नानकसाहब भिन्न २ लोकों द्वीपों ब्रह्माण्डों और पृथिवीको सँर करते फिरते थे, उस समय एक ऐसे स्थानपर पहुँचे जहाँ केवल स्त्रियाँही स्त्रियाँ थीं कोई पुरुष, न था। उनकी उत्पत्ति आश्चर्य रीतिसे है । यह बात नानकसाहबके सफरनामे में कहीं लिखी हुई हैं । ज्ञानीलोग बड़े उड़नेवाले हैं, जहाँ चाहें वहाँ उड़कर चले जावें पर कोई २ ऐसे सुकर्मों भी संसारमें हैं जिनमें उड़नेकी सामर्थ्य नहीं ईश्वरकी कृपा उनको आसमान पर ले जाती है, जैसे कबीर साहब मुहम्मद साहबको ले गये। वाइबुलमें लिखा है कि, एक अरेशा नामक पुरुष शरीर सहित आसमान पर उठाया गया हजरत ईसा भी देहसहित आसमान पर गये, ऐसे सहस्रों पुरुष, परमात्माकी कृपासे देहसमेत ही जहाँ चाहे वहाँ जा सकते हैं ।

राजा युधिष्ठिर भी देह सहित धर्मलोक गये । यह कथा महाभारत आदिमें प्रसिद्ध है, कबीरपन्थके उपग्रीता नामक ग्रन्थमेंभी लिखी है ।

यह तो पुरानी बातें हुई, अब आजकलकी बात सुनो, १८९७ ई० में फरीदकोटमें गेंदाराम नाम का एक अन्धा ब्राह्मण रहता था । तब मैं भी भ्रमण करता हुआ फरीदकोट आकर ठहरा, वह सत्संग का बड़ा अभिलाषी था, मेरे पास नित्य आया करता था ठाकुरजीकी पूजा बड़े प्रेमसे किया करता था । वो अन्धा होनेपर भी अच्छा पंडित था, उसके पास अनेकों विद्यार्थी पढ़ते थे । वो