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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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अक्षय सुखको पाते हैं । नहीं तो संसारमें अधिकांश मनुष्योंकी रुचि सत्तोगुणी तेजोगुणी और तमोगुणी होती है, इससे वे यथार्थ सत्यकी चाहना न करके गुणोंकी प्रेरणासे स्वर्गादिसे लेकर सांसारिक नाशमान सुखोंकीही कामना करते हैं । यह नहीं कि, वे इन्हें नाशमान न जानते हों ? नहीं वे उसे नाशमान भी जानते हैं, क्योंकि, जिन वेद और शास्त्रोंका वे आश्रय लेते हैं, वेही स्वर्गादिक तथा उनके अभिमानी विष्णु ब्रह्मा इंद्रादि देवोंको समय पाकर नाशमान बतलाते हैं । किन्तु गुणोंके प्रभावमें दबी हुई उनकी बुद्धि, उस सत्यको ग्रहण नहीं कर सकती । जिस प्रकार लोभी पुरुष ठगके हाथमें आजाता है और उसीकी लोभ दिलानीवाली बातों से, सत्य मानकर उसी पर भरोसा करता है, उसी प्रकार त्रिगुण कामनाओंमें फँसे हुए जीव सत्यका अनादर कर, लोभ दिलाने वाली, वेदवादकी मिथ्या बातोंकोही सत्य मानते और सत्य कहनेवालोंको नास्तिक निंदक आदि विशेषणोंसे स्मरण करते हैं । इसी बातको भगवान् कृष्ण इसी तीसरे अध्यायके श्लोक ४२, ४३ और ४४ में इस प्रकार वर्णन करते हैं ।

“यामिमां पुष्पितां वाचं प्रबदन्त्यविपश्चितः ।

वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।

क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥ ”

भगवान् कृष्ण कहते हैं—हे पृथापुत्र पार्थ अर्थात् अर्जुन ! जो अविवेकी अर्थात् मूढ़ पुरुष हैं, जो वेदवादमें रत हैं जो वेदवाक्यके अर्थवादमेंही परम प्रीतिवाले हैं वे वेद या उसमें वर्णित नाना कर्मकाण्ड और उनके फलकोही सर्वस्व सर्वोत्तम मानते और कहते हैं कि, इनसे परे कुछभी नहीं हैं । उनकी दृष्टिमें स्वर्गही सब कुछ है । ऐसे मूढ़ पुरुष वेदके उन पुष्पित वाणियों के जालमें पड़े हुए हैं, जो ऊपरसे तो सुन्दर खिले हुए पुष्पके समान परम सुहावना देख पड़ता है, किन्तु उसमें कोई उत्तम गन्ध नहीं होती, केवल देखनेवालेको मोह लेता है । इसी प्रकार वेदकी नाना कामना स्वर्ग आदिकी आशा दिलाने और संसारमें भी नाना सुख ऐश्वर्यको देनेकी आशा दिलानेवाली वेदवाणी पर मोहित होकर अपनी व्यवसायिक अर्थात् उससे परेकी बातको निश्चय करनेवाली बुद्धिको ऐसी कुंठित करलेते हैं कि, उनके सामने सत्य प्रत्यक्ष रूप धारण करके भी खड़ा हो तब भी उसपर उनका विश्वास नहीं होता ।