कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextऐसे लोग वेदके त्रिगुणजालमें फँसकर, लोक परलोककी प्राप्तिके नाना आडम्बर युक्त साधनोंमें, फँसे रहकर अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं। और देवादिसे लेकर कीट पतङ्ग तककी नाना योनियोंमें भटकते हुए आवागमनसे छूटने नहीं पाते। ऐसे वेद पशु वेदके उन सुहावने बचन पर मोहित रहते हैं। जिनमें अनेक प्रकारकी कर्म विधि, अग्नि होत्र, दशं, पूर्णिमा ज्योतिष्ठोम इत्यादि सकाम कर्मों तथा लौकिक फल बनाये गये हैं। वे इन वैदिक कर्मोंसे परे अपना कुछ भी कर्तव्य नहीं समझते।
इसी कारणसे उनकी व्यवसायात्मिका अर्थात् सत्यासत्यको निश्चय करनेवाली बुद्धि ऐसी कुंठित और अविश्वासी हो जाती है कि, वह यथार्थको नहीं समझ सकती।
पैतालौसवैश्लोकमें भगवान् कृष्ण इसी लिये अर्जुनसे कहते हैं; ह अर्जुन ! वेद संसारी है। संसारमें बहुत पुरुषोंकी रुचि सत्व रज और तमकी प्रधानतासे निज निज अधिकारानुसार, सांसारिक भोगों ें लिप्सावाली होती है, इस लिये स्वभावतः लोग उसी उसी प्रकारके भोगोंके पानकी कामना करते हैं; इसी लिये वेदोंमें धन, पुत्र, अश्वादि प्राप्तिके उपाय आदि लोक परलोक स्वर्गादिक कामनाकी पूर्ति ें लिये, नाना प्रकारके अनन्त साधनोंका वर्णन किया गया है, जिनके अनुष्ठानसे पुरुषकी सांसारिक कामनाएँ शीघ्र पूरी होती हैं।
इस प्रकार सब वेदोंमें सांसारिक कामनाओं और विषयोंकी पुष्टीकी बहुलता दिखाकर, भगवान् कृष्ण अर्जुनको यह उपदेश देते हैं कि, हे अर्जुन ! तुझे ऐसी श्रांतिमें नहीं पड़ना चाहिये कि, "जब वेद इसी प्रकारके उपदेश देते और उपाय बतलाते हैं तो हमें वही करना चाहिये, यही मनुष्यका कर्तव्य है" नहीं ! नहीं ! मनुष्य जन्मकी सफलता इसीमें नहीं हैं इसका तो इनसे बहुत ऊंचा पद परमानन्द प्राप्तिके लिये यथार्थ पदको प्राप्त करना इसका असली कर्तव्य है।
इसी लिये तू गुणातीत हो। इन त्रिगुणात्मक वेदोंके झगड़ोंसे अलग होकर इन फँसानेवाली कामनाओंका त्याग करदे। इन कामनाओंसे परे होनेके लिये तुझे उत्साह और धीरज रखकर शीतोष्णादि नाना प्रकारके सांसारिक क्लेशोंके सहनेकेलिये तत्पर रहना पड़ेगा। तुझे लोक परलोक सबको ठुकराकर, सत्यकी ओर जाना पड़ेगा, फिर काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि आपही आप तुझसे डर कर अलग हो जायेंगे।