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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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इसके आरंभ कालसे अर्थात् जब ये वेद कंठस्थ रहते थे, स्मरण शक्तिकी निर्बलतावश उनमें थोड़ी बहुत अशुद्धियाँ रही जाती थीं, तदुपरान्त लिखावटमें भूल तथा त्रुटियाँ होती रहीं । अब वर्तमानकालके मनुष्योंको तनिकभी मालूम नहीं है कि, प्रथम वेद कितना था और अब कितना है । कहीं तो न्यून दृष्टिगोचर होता है तथा लोग जानते हैं कि, वेद इतनाही है । यदि कहीं विशेष प्रगट होजाता है तो लोक कहते हैं कि, वेदका यह भाग छिपा हुआ था अब प्रगट हो गया है । इस प्रकार इस विषयका उचितरूपसे पता नहीं चलता कि, वेद कहाँ २ तथा कितना छिप रहे हैं । पहले ये वेद गद्यमें थे परन्तु अब पद्यमें हो गये हैं । और लेखकोंकी अशुद्धियोंके कारण अब वेदोंकी सूरतमें विभिन्नता आगयी है इन वेदोंमें इनके अत्यंत प्राचीन होनेके कारण अनेक स्थानोंमें गडबड है और अत्यंत गडबड तथा संदेहमय होनेके कारण वेदविज्ञोंको इसकी प्राचीनतामें संदेह होता है और वर्तमानके वेदज्ञ लोग इसको नवीन समझते हैं ।

चीनी तथा योरोपियन लोगोंका विश्वास है कि, वेदको बने केवल ढाई सहस्र वर्ष बीते । किसीका कथन है कि, वेद तीन सहस्र वर्षसे बने हैं, कोई कहता है कि, ये वेद साठे तीन सहस्र वर्षसे आगेके ठहर नहीं सकते हैं । कारण यह कि, ऋषियों तथा इसके लेखकोंने वर्तमान कालके वेदोंमें ऐसी संदेह युक्त वात्ताओंको संयुक्त कर दिया है, जिससे उनकी प्राचीनतामें संदेह होता है । इसके अतिरिक्त लोग कुछ बातें अपनी ओरसे मिलाते और कुछ वेदोंसे निकालते चले आये हैं कि, जिससे वेदके प्राचीनकालमें अनेक शंकायें उपस्थित होती हैं । इसमें बड़ी मिलावट हो गयी और ब्राह्मणों, ऋषियों ने इसको ऐसा अंधकारमें डाला कि, वेद मन्त्र तनिक भी शुद्ध न रहे तथा सम्यकरूपसे अशुद्ध होगये और वेदमंत्रोंका प्रभाव उनमेंसे निकल गया ।

वेद वक्ताओंने बड़ा झगडा मचाया और यथार्थ वेदके विरुद्ध उन नासमझों ने वेदका ऐसा अर्थ लगाया कि, मनुष्य जाति और भी अंधकारमें पड़ गयी, जिससे उनका निकलना, भागना तथा छुटकारा असंभव हो गया । ये वेदपाठीगण जिन्होंने न तो तप किया न स्वसंवेदको देखा, वे क्या जाने कि, वेदका तत्त्व क्या है ? उनकी मूर्खता जिस ओरको खींचती है उसी ओर वे उसका तात्पर्य तथा अर्थ लगाते हैं तथा कुछ मूर्ख उनसे मिलकर उनको इस बात पर और भी उभारते हैं और कहते हैं, कि हां महाराज ! हां स्वामी जी ! जो अर्थ आपने किया वही उचित तथा यथेष्ट है दूसरा अर्थ नहीं, इस कारण इस वेदमें बहुत कुछ इधर उधर हो