कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextबाईसवाँ प्रकरण
वेद तब और अब
सृष्टिकी उत्पत्तिके पूर्व ये चारों वेद प्रगट हुए, उस समय लिखना पढ़ना प्रचलित नहीं था । यह कुछ कहा नहीं जा सकता कि, जब ये वेद प्रगट हुए तब इनका क्या और कैसा स्वरूप था ? कारण यह कि जितने ग्रंथ स्वसम्बेदके इस दासने देखे उनमें केवल इतनाही लिखा, देखा कि, कैलके श्वास से ये चारों वेद उत्पन्न हुए और ज्योतिस्वरूप निरञ्जनकी स्तुति करते रहे । वहाँ पर वेदोंके रूपका कोई विवरण नहीं देखा । ये वेद उत्पत्तिके दिवससे लेकर आज दिन पर्यन्त संसारमें प्रचलित हैं । पर यह संभव नहीं है कि, वेदोंकी वैसीही सूरत रही हो । 'पूर्वकालमें मनुष्यकी स्मरणशक्ति ऐसी प्रबल तथा तीक्ष्ण होती थी कि, एक वेर जो बात गुरुसे चेला सुनलेता था उसी समय उसको कंठस्थ कर लेता था और कदापि भूलता नहीं था और यदि, कहीं किसी शब्द या अक्षरका भ्रम हो तो गुरु अथवा आपसमें पूछ लेता था और शुद्धकरके याद कर लेता था । इन वेदपाठियों को जीवन भरमें वेद भूलता नहीं था और इन वेदोंको लोग जबानी पढ़ा पढ़ाया करते थे । वेदका नाम श्रुति है और संस्कृतमें श्रुति नाम कानका तथा कानसे सुननेका है अर्थात् श्रुति वह है जो सुनी गयी वेद को उत्पत्तिकालके आरंभसे उस समय तक कि, जब तक याद मनुष्योंकी स्मरण शक्तिमें पूर्णतया निर्बलता न आगयी, वे मुखस्थ करते तथा पढ़ते पढ़ाते चले आये । जिनको समस्त वेद कंठस्थ रहता था, वह श्रुतिकेवली अथवा श्रुतिकैवल्यज्ञानी कहलाता था । और वेद द्वारा लोग तीनों कालकी बातोंको जान सकते थे तथा श्रुति केवली सब कुछ बतला सकता था और श्रुतिज्ञान द्वारा कुल बातोंका उत्तर देकर लोगोंको सन्तुष्ट करता था ।
तदुपरान्त क्रमशः मनुष्यकी स्मरण शक्तिमें निर्बलता आतीगयी, और इस बातका भय हुआ कि, स्मरणशक्तिकी निर्बलताके कारण वेद कहीं एकबारही विलोपित न हो जावें । तब वेदव्यासजीने कृपा करके, उनको लिखा और अपने ढंग तथा अपनी विचारानुसार उसको निर्माण करके चार वेदोंके नामसे संसारमें प्रसिद्ध किया । उस समयसे आजपर्यन्त व्यासजीकी कृपासे काम चलता है । जब तक हिन्दुओंका राज्य तथा तब तक वेदोंका बड़ा प्रचार था, पर म्लेच्छों (मुसल मानों) के शासनकालमें इनकी कुछभी मर्यादा नहीं रही और वेदका बड़ा भाग जाता रहा अब बहुत थोड़ा रह गया है । अब जितना बचा खुचा रह गया है उतनेही से कार्य चलता है ।