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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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शक्ति है और कुण्डलिनीका पिता वह है जो अवाङ्मनसगोचर है सो कुण्डलिनी प्रत्यक्ष दिखाई देती है कि, एक सांपिन है और सांपिनका विष वासना अर्थात् प्रत्येक प्रकारकी मानसिक कामनायें हैं—यह विष जिस मनमें समाता है वह मृत्यु को प्राप्त होता है तथा उसका आवागमन कदापि बन्द नहीं होता । जो विष घातक कुण्डलिनीमें है—वही हलाहल प्राणनाशक ॐ में है । ॐ तथा कुण्डलिनी केवल कहनेहीको दो हैं, पर वस्तुतः ये एकही हैं । और जो विष ओम् में है वही वेदोंमें है—सर्पसे विषही उत्पन्न होता है, कभी अमृत नहीं निकलता । यह सिद्धांत है—जब वेदकी उत्पत्ति विषसे है तब फिर वेद विष से पृथक् किसी प्रकार हो नहीं सकता । बीजसे जो वृक्ष उत्पन्न हुआ उसकी जड़, डाली, पत्ते, फल फूल इत्यादिमें वही घातक विष समाया हुआ है । ऐसी अवस्थामें वेद तथा किताबोंकी आज्ञापार चलनेवाले वासनाके विषसे कैसे बच सकते हैं । कुण्डलिनी तथा उसके विषसे जो कुछ उत्पन्न हो सो सब विशैला है । इस कुण्डलिनीने स्त्री और पुरुष होकर समस्त संसारको उत्पन्न किया है । सत्यकवीरने बीजककी रमैनीमें लिखा है —

अन्तरजोत शब्द एक नारी । हरिब्रह्मा ताके त्रिपुरारी ॥

तेहि त्रियाभगलिङ्ग अनन्ता । तेउ न जाने आदिउ अन्ता ॥

यहाँ पर सोचना और समझना चाहिये कि, वाणीरूप माया है, वही स्त्री रूप है और इसीसे ब्रह्मा विष्णु शिव और सब कुछ उत्पन्न हुए जिस स्त्रीसे सब कुछ उत्पन्न हुआ, वह विषैली नागिन है और इसी नागिनका विष तीनों लोक तथा वेदोंमें पैठ रहा है । वही विष समस्त जगत्में भरा हुआ है, कोई स्थान खाली नहीं है ।

जिस समय ये चारों वेद धर्मरायकी श्वासके मार्गसे निकल पड़े सब उन्होंने निरञ्जनकी सूरत न देखा था और न जाना और न पहुँचाना कि, अलख निरञ्जन कौसा है, उसकी मूर्ति कौसी है ? पर चारों वेद स्वरूप धारण करके अलख निरञ्जन की स्तुति करने लगे—कि, आप अलख अगोचर हो, आप ज्योतिस्वरूप निरञ्जन हो, आपकी प्रशंसा नहीं की जा सकती, आप सर्वगुण सम्पन्न हो और आप समस्त संसारके स्वामी हो आपकी महिमा तथा श्रेष्ठताको वेद नहीं जान सकते, आप समझ तथा बुद्धिके परे हो इस प्रकार अनन्तकाल पर्यन्त ये चारों वेद निरञ्जनकी स्तुति करते रहे । तदुपरान्त निरञ्जनकी आज्ञा हुई और कहा कि, हे वेदो ! तुम सब जाकर समुद्रमें छिप रहो । तब निरञ्जनकी आज्ञानुसार वे चारों जाकर सागरमें छिप गये ।