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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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गये और वह कन्या जब कालके मुँहसे बाहर आयी तब अत्यंत भयभीत हुई और कौपने लगी—फिर डरती तथा कौपती निरंजन की आज्ञामें हो गयी, और सत्यपुरुषका ध्यान उसने भुलादिया—कालपुरुषकोही पिता २ कहने लगी और निरञ्जनके साथ रहने लगी ।

ग्यारहवाँ प्रकरण

अद्या-निरंजनका वर्णन

यह आदिकुमारी भवानी कहलाती है और उसके सौन्दर्यका विवरण स्वसंबेदमें बहुत आया है । उसके शक्ति तथा प्रभुताका भी बहुत कुछ विवरण है । यही आदि भवानी तीनों लोककी महारानी है जिसके अधीन ब्रह्मा, विष्णु और शिव और समस्त ऋषिमुनि हैं, यह निरंजनके अधीन है जो कुछ धर्मरायकी आज्ञा होती है उसी कार्यको वह करती है, भयबस कदापि उसकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करती । निरञ्जनके सहवासके कारण उसमें निरञ्जनका समस्त वातें समा गयी हैं और वहभी कालरूप होगयी है यही बीज खेत है जिससे समस्त संसारकी उत्पत्ति होती है, सो महाकाल और महाकाली होगये ।

कुछ दिवसोंके उपरान्त उस कन्यापर रङ्ग रूप चढ़ा और वह युवती हुई, उसके रङ्ग रूपका वृत्तान्त जो ग्रन्थ श्वासगञ्जार तथा दूसरे ग्रन्थोंमें लिखा है, मैं क्या वर्णन करूँ बिजली उसके सामने क्या है ? जिसको स्वयं सत्यपुरुषने अपने शरीर और आप अपने हाथोंसे बनाया है उसके सौन्दर्य और रूप तथा तेजका विवरण क्या होसके । जब वह युवती हुई, तब निरञ्जन तथा अद्याका विवाह हुआ और दोनों प्रसन्नता पूर्वक आनन्दमें रहने लगे । उस सुख विलासका विवरण किससे हो ? जो अद्या तथा निरञ्जन किया करते थे । उस सुख विलास में अनन्त काल बीत गया ; तब निरञ्जनने अद्यासे कहा कि, अबतो मुझको सत्य पुरुषके लोकमें जानेकी कोई आशा नहीं है, मैं यहाँही सत्यपुरुषके समस्त लोकों और द्वीपों इत्यादिकी रचना करूँगा और तुझको भी मैं अपने साथ बल पूर्वक रक्खूँगा और हम और तुम दोनों मिलकर सदैव तीनलोक भवसागरका राज्य करेंगे और सब पर आज्ञा किया करेंगे, यहीं सदा निवास करेंगे, सत्यलोक के जाने की कोई आवश्यकता नहीं है ।

तपके प्रभावसे यह कालपुरुष अत्यन्त बलिष्ठ होगया और अपने घमण्डके कारण कितनेही दोष किये, कूर्मका तीन शिर काटा तथा अद्याको निगलगया, अक्षरसे समर ठानकर उसको भी मारकर उसकी राजधानीसे भगादिया । इन