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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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नवों प्रकरण

निरंजनका पुनः तपस्याकर बीजखेत माँगना

अब निरंजनका बूत्तान्त सुनो कि, उसने जो कूर्मजीके तीन शीश काट लिये थे उन तीनों सिरोंको खालिया और फिर शून्यमें जाके फिर एक पगसे खड़ा हो योग समाधि लगाकर भहा कठिन तपस्या करने लगा । इस प्रकार अटल तपस्या करते २ सोलहयुग बीत गये, तब पुनः सत्यपुरुषकी वाणी आयी कि, अब क्या चाहता है ? तब निरंजनने निवेदन किया कि, मुझे अब बीजखेत प्रदान कीजिये—कारण यह कि, बिना बीजखेतके उत्पत्ति नहीं हो सकती—तब सत्यपुरुषने कहा—तथास्तु ।

दसवों प्रकरण

बीजखेत, अर्थात् आदिभवानीकी उत्पत्तिका वर्णन

जब निरंजनने बीजखेतकी प्रार्थना की, तब सत्यपुरुषने एक कन्या प्रकट की । वही आगे अधाके नामसे प्रसिद्ध हुई । यह ऐसी सुन्दरी तथा हावभाववाली प्रकट हुई कि, जिसको देखतेही चित्त चञ्चल हो आसक्त हो जावे—उस मोहिनी मूर्ति तथा मनोहर रूपका बहुत कुछ विवरण स्वसंबेदमें है । जब वह आदि कुमारी उत्पन्न हुई तब सत्यपुरुषने कहा कि प्यारी बेटी ! तू निरंजनके पास जा, तेरे ऊपर सदैव मेरी दया रहेगी । तब वह कन्या निरंजनके पास आयी और जहाँ निरंजन योग समाधि लगाकर बैठा था वहाँ आकर एक पैरसे खड़ी हुई । जब निरंजनकी समाधि खुली तो अपने सामने कन्याको देखकर कहा कि, हे भवानी ! तुझको मेरे निमित्त सत्यपुरुषने उत्पन्न किया है, आओ हम तुम दोनों मिलकर तीनलोक भवसागरकी रचना करें । उस समय निरंजन कामातुर हुआ । तब अध्याने कहा कि हम तुम दोनों भाई बहिन हैं—मेरा तुम्हारा सम्बन्ध उचित नहीं है । तब निरंजनने उसे बहुत कुछ समझाया, परन्तु भवानीने नहीं माना, तब वह अत्यंत क्रोधित होकर अधाको पकड़ अपने मुँहमें रखकर निगलने लगा । निगलने के समय अध्याने सत्यपुरुष ! सत्यपुरुष !! कहकर पुकारा । इतनेमें कालपुरुष भवानीको निगलही गया । अधाको पुकार सुनकर सत्यपुरुषकी आत्से तुरन्त जोगजीतजी प्रकट हुए—और सुरतिके तीरसे कालको मारा, तब उसने उसी समय अधाको अपने मुँहके बाहर डाल दिया । जोगजीतजी उसी समय अन्तर्धान हो