Skip to content
SarvaKosh
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 69 of 1367

Read in context
Page 69

प्रचलित नहीं होता, थोड़े लोग उद्धार पाते हैं, परन्तु इस कलियुगमें इस धर्मका विशेष आन्दोलन होगा, विशेषकर जब कलियुग पाँच सहस्र और पांचसौ वर्ष बीत जायेंगे, तब उस समयमें पृथ्वीके यावत् मनुष्य इस पंथको ग्रहण करेंगे । जब तक वह समय न आवेगा तबतक यह पंथ धीरे २ चलेगा, कभी न्यून और कभी अधिक होता रहेगा और जब वह समय आपहुँचेगा तब समस्त संसारको मुक्त करनेकी आज्ञा आवेगी और कबीर साहबकी कृपा कटाक्षसे समस्त मनुष्योंका अन्तःकरण शुद्ध हो जावेगा और सब पापोंसे अलग हो कर और सुकृत करनेकी ओर उद्यत होंगे और प्रत्येक घरोंमें सत्यनामकी पुकार होगी, सन्त महन्त ठौर ठौर फिर फिरके लोगोंको सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश देंगे और सब मनुष्योंके हृदय पवित्र होकर उस भक्तिको ग्रहण करेंगे तब कालपुरुषको पहचानके उससे दूर भागेंगे ।

तीसरा प्रकरण

स्वसम्बेदके प्राकट्यका वृत्तान्त ।

प्रथम सत्यपुरुष अकेला था, उसका न कोई साथी और न चेला था । जब उसने जगत् प्रकट करना चाहा तब उसने प्रथम ब्रह्मसृष्टि अर्थात् अपनी सन्तानों को प्रकट किया। उन सब सन्तानोंमें ज्ञानीजी अर्थात् अपनी सन्तानोंको प्रकट किया। उन सब सन्तानोंमें ज्ञानीजी अर्थात् कबीर साहब सबसे श्रेष्ठ हैं, अनेक बार कबीर साहबने स्वतः कहा है कि, वह जो सबसे ज्येष्ठ पुरुष कहलाता है स्वयं सत्यपुरुष है—अर्थात् मैं स्वयम् सत्य पुरुष हूँ, जिसे इस बातपर श्रद्धा है वह दूसरी ओर तनिक भी ध्यान नहीं देता और स्वयं कबीर साहबहीको सत्यपुरुष मानता है और जिसे इस बातका विश्वास नहीं है वह उन्हें सत्य पुरुषका भेजा हुआ मानता है । जब जैसा जिसका विश्वास होता है वैसाही उसका फल होता है । सो जब ब्रह्मसृष्टि उत्पन्न हुई तब कबीर साहब द्वारा ब्रह्मसृष्टिको स्वसंबेद मिला, और वह स्वसम्बेद कबीर साहबकी वाणी है । यह स्वसंबेद निष्कलंक तथा निर्दोष ब्रह्मसृष्टिमें प्रचलित हुआ । फिर सर्वशक्तिमानने जीवसृष्टिको उत्पन्न किया । ब्रह्म सृष्टि और जीवसृष्टि अर्थात् ब्रह्मकी रचना और जीवकी रचना अत्यंत पवित्र हैं । जैसे वे पवित्र तथा निर्दोष हैं वैसेही स्वसंबेद निर्मल तथा निष्कलंक हैं । इस स्वसंबेदमें किसी प्रकारकी अनुचित बात नहीं है अनुचित बातका उसमें चिह्नतक नहीं है यह स्वसंबेद अनन्त तथा असीम है । स्वसंबेद और उसकी