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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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वाणीकी जो गिनती किया चाहे—वह समस्त पृथ्वीके पत्तोंकी गणना करे—अर्थात् पृथ्वीपरके वृक्षोंकी इतनी पत्तियाँ हैं और गङ्गाकी रेतमें इतने अणु कि, उनकी गिनती नहीं हो सकती है, ऐसाही असीम अनन्त स्वयंबेद है। जो उसकी गणना करनेका ध्यान करे वह विक्षिप्त है।

चौथा प्रकरण

ब्रह्मसृष्टि का वर्णन

सत्यपुरुषने जब सृष्टिके उत्पन्न करनेकी ओर ध्यान दिया तब पहले छः पुत्र प्रकट किये—१ सहज, २ अंकूर, ३ इच्छा, ४ सोहं, ५ अचिन्त और ६ अक्षर। यह छः पुत्र बड़े दयालु और प्राणीमात्रके निमित्त मुक्ति मार्ग दिखलानेवाले प्रकट हुए, जो सदैव सत्यपुरुषकी स्तुति करते रहते हैं। जब इन छः पुत्रोंको सत्यपुरुष प्रकट कर चुका तब उसने विचार किया कि, ये छः ब्रह्म दयालु और सब जीवोंको निर्भय कर देनेवाले प्रकट हुए हैं—पर भविष्यमें मनुष्य बहुत निर्लज्ज और निर्भय होकर, काम क्रोध लोभादिकोही, अपना ध्येय समझकर, सत्यपुरुषकी भक्तिसे विमुख होंगे और सुकृतकी ओर ध्यान न देंगे। यह विचार कर सत्यपुरुषने सातवें पुत्र अपने तेजसे प्रगट किया, यही अत्यंत बलवान् कालपुरुष सर्व जीवोंको दुःख-दायी हुआ। इसी प्रकार कहीं सात पुत्र, कहीं आठ पुत्र कहा है और कहीं सोलह पुत्र भी कहा है। ये सब ब्रह्मसृष्टिके अन्तर्गत हैं और कहीं ब्रह्म-कहीं हंस-द्वीप द्वीपान्तरोंपर अधिकृत कर दिये हैं। इस प्रकार सत्यपुरुषने अपने सब पुत्रोंको स्थान २ पर राज्य तथा प्रभुत्व देदिया—वे सब अपने २ द्वीपों और लोकोंमें राज्य करते हैं। पर ये सात पुत्र ऐसे हैं जिनकी पृथ्वी से लेकर सत्यपुरुषके लोकपर्यंत बराबर उनकी राहकी डोरी लगी हुई है—और जितने ब्रह्म भिन्न २ लोकों और द्वीपोंमें राज्य तथा प्रभुत्व भोगने हैं उनका वृत्तान्त स्वसंवेनमें दृढ़ने तथा उसके पाठ करनेपर प्रगट होगा। ये ब्रह्मसृष्टिके अधिकारी कभी बंधनमें नहीं आते केवल मायासृष्टिके लोगोंको बन्धन और कालका भय है। स्वसंवेदमें सृष्टिकी, उत्पत्तिके बहुतभेद हैं—यहां थोडासा लिखा गया है।

पाँचवां प्रकरण

काल पुरुषके प्राकट्यका वर्णन

अक्षर जो सत्य पुरुषका छठा पुत्र था, वह जहां बैठा था उस स्थानपर सारा जलहीजल था प्रत्येक स्थान जलसे परिपूर्ण था (देखो ग्रन्थ कबीरवाणी)