कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextवाटिका सहस्रों प्रकारके फल फूलसे भर गई। सहस्रों प्रकारके फल और फूल निकल पड़े जो कि, पहले कभी न देखे और न सुने गये थे। उन्हींसे वह वाटिका पूर्ण हो गई। फल फूलसे भरे वृक्षोंपर बुलबुल तथा भौंति भौंतिके पक्षी बोलने लगे। चारों ओरसे पक्षियोंका चहकारा सुनकर माली आश्चर्यसे चकित हुआ कि, यह वाटिका कैसे हरी-भरी हो गई? उसे बहुत फल फूल तथा मेवोंको लगा देखकर मालो बड़ाही हर्षित हुआ। उनमेंसे अनेक प्रकारके फूल, फल, मेवे डालियोंमें भर भरकर वह माली राजाके समीप आया, भेंट करके निवेदन करने लगा कि, महाराज! आपकी वाटिका हरी हो गई। भौंति भौंतिके फल, फूल और मेवे लग रहे हैं। हे महाराज! आपकी नौलखी फुलवारी ऐसे यौवनोंपर है कि, उसका वर्णन किया नहीं जा सकता है। राजाके समक्ष जब पुष्पों और मेवोंकी टोकरियाँ मालीने रखीं, तो वो देखकर राजा और उसके मन्त्रिवर्ग ऐसे चकित हुए कि, ऐसे फल फूल तथा मेवे हमने कभी देखे सुने न थे। न जाने ये कहाँसे आये? यह बात सुनकर राजा परम हर्षित हुआ। मन्त्रियों मुसाहबोंसे कहने लगा कि, आश्चर्यकी बात है। पश्चात् राजाने ज्योतिषियोंको बुलाया और वाटिका देखने चला। राजाके साथ समस्त मन्त्री मुसाहब तथा प्रजा थी। ज्योतिषियोंने कहा कि, महाराज! इस वाटिकामें कोई महापुरुष आकर बैठा है जिसके कारण यह वाटिका हरी भरी हो गई है। तब राजा उस वाटिकाको देखनेपर अत्यन्त ही आह्लादित हुआ। आज्ञा दी कि, इस वाटिकामें जाकर ढूँढो। लोग ढूँढने लगे। ढूँढते ढूँढते देखा कि, एक स्थानपर एक महापुरुष आसनमारे ध्यान लगाये बैठा है। सबोंने राजाको समाचार दिया। राजाने जाकर दण्डवत् प्रणाम किया। राजाके साथ समस्त मन्त्री तथा प्रजा आदिने दण्डवत् प्रणाम किया। राजा कहने लगा कि, मैं बड़ाही भाग्यवान् हूँ कि, ऐसे महापुरुषने मुझको दर्शन दिया जिसके कि, विराजने मात्रसे वर्षोंकी सूखी वाटिका हरी होगई राजाने सत्यगुरुका दर्शन किया तब हृदयमें ठण्ढक आई उसका चित्त स्थिर हुवा। राजाने कहा कि, महाराज! बारह वर्षसे यह वाटिका शुष्क पड़ी थी इसके समीप कोई नहीं आता था। आपके चरणरजसे यह वाटिका हरी भरी हो गई, आपके दर्शनसे मेरा हृदय प्रफुल्लित तथा प्रसन्न हो गया। अब महाराज! मुझपर दया दृष्टि डालिये, मेरे मस्तकपर हाथ रक्खिये। मुझको मुक्ति प्रदान कीजिये हे सत्यगुरु! मैं आपके साथ रहूँगा।
सत्य कबीर वचन।
चौ०—तुम तो कौल भुलाने भाई। किये कौल तुम गए भुलाई ॥