कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 591 of 1367
Read in contextहे राजा ! जब तुम मातृगर्भमें थे तब तुम वचन बद्ध हुए थे कि, भजनके अतिरिक्त अब और कुछ न करेंगे, उस दुःखमें तो तुम पुकारते थे तथा हाय हाय करते थे कि मुझको इस दुःखसे निकालो, पर जब तुम गर्भके बाहर आये तब अपनी सारी प्रतिज्ञाओंको भूल शारीरिक कामना तथा पशुधर्मके वशीभूत होकर तुमने कैसे कैसे कुकर्म किये ? सत्यगुरुकी दयाको तुम एकबारही भूल गये, भोग विलासमें फँसकर अन्धे हो गये, मायाने तुम्हारे ज्ञानको बिलकुलही नष्ट कर दिया । जब यमदूत आवेंगे तुम्हारी मुश्कें बाँधकर नरकमें लेजावेंगे तब तुम्हारा कौन मित्र सहायता करेगा ? तुमको उनसे कौन छुड़ावेगा ? राजा ! तुम सोचो समझो कि, वे लोग जिन्हें तुम अपना मित्र समझते हो उनमेंसे कौन उस समय सहायक होगा ? कौन तुमको नरकसे बचावेगा ? मैं गर्भमें तुमको बहुत समझाया था, हे गँवार ! तू उन सब बातोंको भूल गया । मैंने सबसे घर घर पुकारकर कहा पर मेरा कहना किसीने भी न माना । इतनी बात सुनकर राजा बोला कि—
चौ०—अबतो सद्गुरु होहु सहाई । मोको जमसे लेहु छुड़ाई ॥
सबही करम बख्शकै दीजे । डूवत मोहिं उबारके लीजे ॥
सैन करि पालकी मँगवाई । लै सद्गुरुको माहिं बिठाई ॥
पाँव उभाड़ काँध धर लीन्हा । तबही महल पयाना कीन्हा ॥
सत्गुरु पगधर महलके माहीं । सब रानिनको राय बुलाहीं ॥
समरथ दरशन दीन्हौ आनी । धन धन भाग्य तुम्हारो रानी ॥
सत्गुरुको पलँग बैठाई । सब मिलि पाँव पखारो आई ॥
राजा भाखै शीष नवाई । मोको राखो गुरु शरनाई ॥
करिये सद्गुरु जीवको काजा । दया करो मैं लाऊँ साजा ॥
अब हम सरना लेब तुम्हारे । दया करो तन दुखत हमारे ॥
सत्यगुरु वचन ।
कस चल राजा लोक हमारा । मैं नहिं देखूँ लगन तुम्हारा ॥
कोटिन ज्ञान कथो असरारा । बिना लगन नहिं जीव उबारा ॥
जैसे लगन चकोर की होई । चन्द्र सनेह अँगार चुंगोई ॥
ऐसे लगन गुरुसे होई । धर्मराय शिर पर धर सोई ॥
तुम तो हो मोटे महाराजा । कैसे छोड़िहौ कुल मर्यादा ॥
कैसे छोड़िहौ मान बढ़ाई । कैसे छोड़िहौ मुख चतुराई ॥