कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 589 of 1367
Read in contextउस समय कबीर साहब करुणामय ऋषिके नामसे प्रसिद्ध थे । सहस्रोंको उपदेश करते फिरे, इस कालमें केवल तीन शिष्योंका वृत्तान्त जानता था । श्वपच सुदर्शन, गरुड़जी और दुर्वासाऋषि सो मैंने लिख दिया है । सहस्रोंने सत्यगुरुकी दयासे मुक्ति पाई, उनका विशिष्ट वर्णन यहाँ नहीं किया जा सकता ।
राजा जगजीवन ।
कबीर सागर नं ५ में जगजीवनबोध है । इसमें धर्मदास पूछता है तथा कबीर साहब मातृगर्भका समस्त वृत्तान्त कहते हैं कि, जब यह राजा अपनी माताके गर्भमें था तब दुःख तथा कष्टसे विकल होकर पुकारता था कि, हे सत्यगुरु ! मुझे इस नर्कसे निकालो । मैं आपका भजन तथा भक्तिके अतिरिक्त और कुछ न करूँगा । यह सब गर्भके भीतर सत्यगुरुसे वार्तालाप हो रहा था । वहाँ मातृगर्भके दुःखका वृत्तान्त अनेक रूपसे कहा गया है । जब यह राजा गर्भसे बाहर आया उस समय उसको गर्भके भीतरकी प्रतिज्ञाएँ भूल गईं । उसके माता पिताने बड़े बड़े गुणी तथा पण्डितोंको बुलाकर धागा गण्डा बँधवाया और बहुत तरहकी युक्तियाँ की, जिससे कि, बालककी आयु बढ़े । बड़े लाड़ चावके साथ पालन किया । जब वो बालक युवावस्थाको प्राप्त हुआ तो अनेक विवाह किये, कामकी तरङ्गोंमें पड़कर हिलोरे लेने लगा । जहाँ सुन्दर स्त्री सुनी बलपूर्वक मँगवाकर दिन रात भोग विलासमें लगा रहता था । भैरव, हनुमान तथा चण्डी इत्यादिके पूजामें भूला रहा । यही दशा सब मनुष्योंकी है कि, जब मातृगर्भके कठिन कष्टमें फँसता है तब प्रतिज्ञाबद्ध होता है कि, मैं तेरा भजन करूँगा । फिर बाहर आकर भूल जाता है और सांसारिक कामनाओंमें फँसकर मर जाता है तब सत्यगुरुकी दयालुताकी सोता प्रवाहित होती है । वे जीवोंको अचेत निद्रासे जगानेके लिये पृथ्वीके चारों तरफ फिरते हैं । इसी तरह फिरते २ पट्टन नगरमें आये, जहाँ यह राजा रहता था । राजा भोग विलासमें ऐसा निमग्न हो रहा था कि, भगतोंको देखकर हँसा करता और ज्ञान ध्यान कुछ न मानता था । कबीर साहब कहते हैं कि, मैंने इस नगरमें घूम घूमकर व्याख्यान किया परन्तु किसीने कुछ नहीं सुना । तब मैंने सोचा कि, राजा किस प्रकार कहना माने, पश्चात् यह युक्ति की कि, उस राजाकी एक फुलवारी थी जो चार कोस लम्बी तथा तीन कोस चौड़ी थी वह वाटिका बारह वर्षसे शुष्क होगई थी । उसकी लकड़ियाँ भी शुष्क होकर गल जानेके समीप हो गई थीं इसी शुष्क वाटिकाके एक कोनेमें मैं (कबीर साहब) आसन मारकर बैठ गया । फुलवारी जो बारह वर्षसे सूख गई थी सब हरी भरी हो गई । वृक्ष लहलहाने लगे ।