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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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चाहता है। जबलों उसमें जातीयताका ध्यान रहेगा तबलों न तो उसको ज्ञात होगा, न मुक्ति ही होगी। यही सब सन्तों और सत्यगुरुकी आज्ञा है। अब रहे चार आश्रम। सो इन चार आश्रमोंमें प्रथम श्रेणी ब्रह्मचर्यकी है। इस ब्रह्मचर्यकी अवस्थामें वेदपाठ इत्यादि मनुष्योंको आवश्यक है। कारण यह कि, मनुष्यको छोटेपनमें और दूसरा कर्म इससे अच्छा है ही नहीं।

ब्रह्मचर्योपरान्त संसार करनेकी आज्ञा है। जिसको गृहस्थाश्रम कहते हैं। जब मनुष्य वेदपाठसे निस्तार पावे तब संसार करने कहा है। इस कारण कि, वेदपाठद्वारा सांसारिक काम धाम भलीभाँति हो सकता है। सांसारिक काम धाम यज्ञ हवन दान इत्यादिके ठीक ठीककरनेका ढङ्ग उसको मालूम हो जाता है। जब वेदपाठी होकर पुनः संसारके बखेड़में पड़ा तो वेदपाठ मुक्तिमार्ग न ठहरा जिसने कि, सांसारिक कार्योंमें लिप्त किया। गृहस्थोपरान्त वानप्रस्थकी श्रेणी है। जब गृहस्थ एकसमयपर्यन्त कर चुका तब वानप्रस्थकी अवस्थाको स्वीकार करता है। ऐसी अवस्थामें उसको वनमें रहने, अग्निकी सेवा और आत्मातत्त्वके विचारनेकी आज्ञा है। जब मनुष्य वानप्रस्थ हो जाता है, तब पहलेकी दोनों अवस्थाएँ झूठी ठहर जाती हैं। वानप्रस्थके उपरान्त चौथी श्रेणी संन्यासकी है उस आश्रमकी यह प्रशंसा है कि, जब मनुष्य तीन ईषणाको छोड़ दे तब संन्यासको स्वीकार कर सकता है। वह तीनों ईषणा ये हैं—स्त्री, पुत्र, धन जबलों इन तीनोंसे स्नेह रहेगा तबलों कोई संन्यासी नहीं हो सकता है जब मनुष्य संन्यासी ठहर गया तब पहलेकी वह तीनों अवस्थाएँ मिथ्या तथा बेजड़की ठहर जाती हैं। जब यह संन्यासी हो गया तब उसको निश्चय अद्वैत ब्रह्मका ध्यान करना पड़ता है। जब यह शुद्ध चेतन अद्वैत ब्रह्मका ध्यान करता है। जिस अद्वैत ब्रह्मका ध्यान करता है वह अद्वैत ब्रह्म ध्यानमें नहीं आता और जो ध्यानमें आता है सो सब द्वैत है। अद्वैत ब्रह्मपर्यन्त मन बुद्धि वाणी इन्द्रिय आदिकी तनिक भी पहुँच नहीं हैं। उसका रूप वही कृपाकरके दिखा दे तो दिखा दे नहीं तो दर्शन होना कठिन है। यदि वो गृहस्थमें दर्शन दे तो उसी अवस्थामें भी वो सब कुछ बना सकता है।

जब इन चारों वर्ण तथा आश्रमको यह छोड़ दे तब मुक्तिमार्गको ढूँढ़ सकता है। इस कारण इस बातको भली भाँति जानलेना चाहिये कि, संसारियोंको पुस्तकपाठ तथा वेदपाठ सांसारिक कार्योंके निमित्त है। मतलब कामना मुक्ति मार्गमें बिलकुलही व्यर्थ हैं। पर निष्कामोंको यही मोक्षके साधन है। वहाँ केवल सत्यगुरुके पथ दिखानेकी आवश्यकता है। भक्तिके दीवाने तो भक्तिके सिवा