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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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पकड़ रखा है । जीव अपने भ्रमसे आपही बन्ध रहा है यदि वहम छोड़ दे तो उद्धार पा जाय पर अन्धेर नगरीमें अपनेको भूलकर बैठता है इस कारण दुख पा रहा है यदि भगवान् कृपा करें तो उद्धार हो जायगा ।

हंस कबीरकी स्थिति ।

जब मैं काशीके पागलखानेमें गया तो वहाँ थोड़ी देर तक ठहरा । वहाँका रङ्गदङ्ग देखकर वहाँ अधिक कालपर्यन्त ठहरनेका उचित नहीं समझा । शीघ्रही वहाँसे फिर नगरको ही चला आया । इसी प्रकार हंस कबीर इस ब्रह्माण्डके भीतर कागभुशुण्ड तथा लोमश ऋषि इत्यादिकी तरह रहते हैं । परन्तु सांसारिक कामनाएँ उनको लुभा नहीं सकती वे सदैव अलग रहते हैं । जैसे कमल जलमें रहता तो है पर जलसे पृथक् रहता है । इसी प्रकार हंसकबीर पर सांसारिक कामनाएँ असर नहीं करतीं और जो लोग कामनाकी तरङ्गोंमें फँसे हुए हैं । वही लोग बिगड़ते हैं उन्हींको कालपुरुष भूनभूनकर खाता रहता है ।

उनपर दया करके कबीरसाहब पुकारते फिरते हैं कि, ए विक्षिप्त मूर्ख मनुष्यो ! मेरा कहा मानो, कालपुरुषका भोजन मत बनो । कोई भाग्यवान कबीरसाहब तथा हंसकबीरका कहना मानता है और पागलखानेसे घृणा करके भागता है । कोई महाशय इस बातसे रुष्ट न हों कि, मैंने सबको पागल लिखा है । यह बात कदापि नहीं । मैंने केवल उन्हीं लोगोंके निमित्त लिखा है जो संसारिक कामनाओंमें पड़े रहकर मुक्तिके इच्छुक रहते हैं । जो साधु सन्त और पीर पैगम्बर इत्यादि कामनाको तुच्छ तथा सांसारिक कामनाओंको घृणा दृष्टिसे देखते हैं, वे बंधनसे निश्चय छूट जावेंगे । केवल काम-क्रोधादिकके बंधनमें पड़े हुए पुरुषही इस ब्रह्माण्डमें पड़े रहेंगे । इन्हींके निमित्त पाप पुण्य नरक वैकुण्ठ आदि सब कुछ बनाया गया है, वेही कुत्सितताके कोड़े हैं । जबलों दुनियाँका जाल है, तबतक जादूगरका गुलाम है । यदि उन मनुष्योंमें तनिक भी बुद्धि होती तो अपने मनमें सोचते समझते कि, वे लोग जिससे अपनी मुक्तिके इच्छुक हैं मुक्तिका एकमात्र भाग समझते हैं । वे सब उन्हींके समान दुःखदायी तथा कम्मेंके बंधनमें बँधे मारे मारे फिरते हैं, कोई छुटकारा नहीं पाता । इस कारण उन मनुष्योंमेंसे किसीकी बुद्धि ठिकाने नहीं है कि, उनमें यह सूझ बूझ उत्पन्न हो । जो लोग कुत्तेकी पूँछ पकड़कर महानदके पार हो जाते हैं वो उनको मूर्खता मात्र है ।

जिसने इस ब्रह्माण्डकी रचना की उसने चारों वेदकी आज्ञाएँ ठहराई और चार वर्ण और चार आश्रम बनाए । मनुष्य बंधना ध्यान करना है मुक्ति