Skip to content
SarvaKosh
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 481 of 1367

Read in context
Page 481

सबको निकम्मा समझते हैं । इसी विषयपर कबीर साहिबने एक शब्द लिखा है —
पण्डित कौन कोबधि तोहि लागे । तू राम न जपै अभागे ॥

वेद पुराण पढ़े क्या होए क्या खच्चर सिरमारा ।

रामनामकी सुद्ध न जानी बूडचो सब परिवारा ॥

वेद पुराण सुनैका यह मत सब घट चीन्हों रामा ।

सब घट ब्रह्म एककर जाना सुफल होय तेरो कामा ॥

नारद कहै व्यास मुख भाषै शुकदेव पूछो जाई ।

कहैं कबीर एक राम जाने बिन बूडी सब ब्रह्मणाई ॥

ए पण्डित ! यह तुझे क्या कुबुद्धि लग गई कि, जिससे ए अभागे ! तू राम राम नहीं कहता । तूने इतने वेदशास्त्र पढ़े हैं, क्या उनसे तुमने कुछ भी सार ग्रहण नहीं किया ? यौही रट रट कर शिर खालीकर डाला । तूने राम नामका रहस्य न समझा । सारा कुटुम्ब पंडित होकर पढ़ पढकर ही संसार सागरमें डूब गया वेदपुराण सुननेमें क्या है जिस रामकी रामायण सुनते हो उसको सबमें व्यापक देखो, सबमें एकही राम देखो, भेद भाव मत मानो, सब काम सफल हो जायेंगे । यदि मेरी बातमें सन्देह हो तो नारद और व्याससे पूछलो । वे भी यही बतायेंगे भलेही शुकदेवसे पूछलो । कबीर तो यही कहते हैं कि, बिनारामके जाने सब पंडिताई डूब गई क्योंकि, सब ब्राह्मणपना उसीमें है ।

अध्याय १२ ।

विश्वास ।

चित्त जिधरको फिरता है उसको बुद्धि मान लेती है । वह बात मिथ्या हो, अथवा सत्य हो सत्यके रूपसे दिखाई देती है । बुद्धि और विश्वास दोनों मिथ्या हैं विश्वास, मिथ्या और निष्कारणको कारणवाला बना लेता है । सारे विश्वास अविद्यामें सत्य हो रहे हैं । पर लुढ़नी विद्यामेंही सबकी यथार्थ अवस्था जानी जाती है । जिस बात अथवा जिस भस्मपर विश्वास होगया हो वही सच्चा तथा ठीक माना जाता है । यदि विचार करके देखा जाय तो यही स्वर्ग नरक दोनोंका कारण तथा बन्ध मोक्षका पिता है ॥

विश्वासकी झलक ।

वैरागी लोग विष्णु तथा रामकृष्णका पूजन करते और आठ प्रकारकी मूर्तिपूजाको सत्य जानते हैं और इस मूर्तिपूजासे अपनी कामना पूर्ण करते