कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextपार्वतीके हाथ पावोंको काटकर समूचा रख लिया था । वह सार खानेके निमित्त शिवजीके सामने धर दिया । पार्वतीके कटे हुए हाथ पाँव भी साथही सामने रख दिए । वह पार्वतीका हाथ पाँव देखकर शिवजी अत्यंत दुःखी हुए कि, इन सबोंने पार्वतीको मार डाला, जब इन देवियोंने शिवजीको अत्यंत दुःखी देखा तब पार्वती को इन सब देवियोंने पुनः जीवित किया । पार्वती जैसे पूर्व थीं वैसेही पुनः शिवजी के पास बैठ गईं । तब शिवजी उन देवियोंसे नितान्तही प्रसन्न हुए । उन सबोंके साथ दृष्टिभोग किया वे सब गर्भवती हो गईं और उन देवियोंसे पुत्र उत्पन्न हुए । सो सब अपनी माताकी सूरतके थे । वे सब बच्चे तो अपना २ वय पूरा करके मर गए । परन्तु उनमेंसे एक कागभुसुंडी अमर हो गया । वह सदैव जीवित रहता है, महाप्रलयमें भी नहीं मरता, वह नीलगिरि पर्वतपर रहता है और बड़ा प्रसिद्ध ज्ञानी है ।
देवीभागवतके सप्तम स्कंधके तीसवें अध्यायमें लिखा है, कि एक बेर दुर्वासा ऋषि हाम्बूनदीश्वरी भगवतीका दर्शन करनेको गए । माया बीज मंत्रको जपा, तब भगवतीजीने हर्षितहोकर अपने गलेकी माला उतारकर दुर्वासाजीको दे दी, वह माला पहनकर दुर्वासाजी राजा दक्षजीके घर गए, सतीजीको दंडवत् प्रणाम किया, तब राजा दक्षने दुर्वासा ऋषिसे प्रार्थना करके वह माला माँगली । अपने गलेमें पहनकर रात्रिके समय राजाने वह माला उतारकर अपने पलँगपर रख दी और अपनी स्त्रीसहित इस पलँगपर लेट रहा । उस मालाकी अप्रतिष्ठा होनेके कारण भगवतीजी अत्यंत क्रुद्ध हो गईं । राजा दक्षकी बुद्धि भ्रष्ट होगई, वह शिवजीसे वैर करने लगा । सतीजीने राजाको शिवका विरोधी देखकर अपनेको अग्निकुण्डमें भस्म कर दिया । सतीजीके भस्म होनेसे शिवजीका क्रोध ऐसा भडका और शिवजीके शरीरसे ऐसी अग्नि बहिर्गत हुई कि, मानों वह तीनों लोकको भस्म किया चाहती है । इस अग्निमेंसे वीरभद्र उत्पन्न हुआ, वह वीरभद्र कालीके गणमेंसे था । इस वीरभद्रके तेजको देखकर समस्त देवता भयभीत हुए । शिवजी के शरण आए । तब शिवजीने कहा तुमको उससे कुछ भी आपत्ति नहीं तुम भयभीत न हो और वीरभद्रको आज्ञा दी कि, तुम राजा दक्षके गृह जाओ, उसको अपना भय दिखलाओ । वह वीरभद्र राजाके घर गया उसका शीश काट डाला । शिवजीने राजाके यज्ञके स्थाममें जाकर सतीजीके शवको राजाके यज्ञकुण्डसे निकाल लिया । अपने कंधेपर रखकर ढाढ़े मार २ कर रोने लगे, हाय सती ! हाय सती ! ! पुकारने लगे । ब्रह्मासे लेकर समस्त देवतागण चिन्तित हुए । शिवजी उस शवको अपने कंधेपर धरे रोते हाय सती ! हाय सती ! ! पुकारते विदेशको