कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextयह उसी सत्य पुरुषकी आज्ञाका पालन कर रहा है तथा मोक्ष तक पालन करता रहेगा ।
शिवजी महाराजकी कथा ।
शिवजी समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ हैं । सबके अग्रणी हैं, विष्णुके समान शिवजी की पूजा भी तीनों लोकोंमें हुआ करती है, पुराणों तथा समस्त शास्त्रोंके देखनेसे विशेषतः शिवपुराणसे आपकी श्रेष्ठता तथा बड़ाई प्रगट होगी, ये शिवजी जगत्के संहार करनेवाले हैं; बड़े वीर तथा साहसी हैं ॥
वाम मार्ग ।
वाममार्ग एक तरहका शिवका धर्म है । इस धर्ममें जाति पौत्तिका तनिक भी ध्यान नहीं किया जाता है । मंदिरा मांस मछली इत्यादि खाते पीते हैं । अघोर धर्म और अघोर क्रिया समस्त वाममार्गकी शिक्षासे है । विशेषतः योगी संन्यासी मुहम्मदी और शक्ति धर्मके अनेक प्रकारके मनुष्य सब इस मतमें भूत प्रेत राक्षस जिन्द और परी इत्यादि सब इसीमें हैं । यह पन्थ क्रोध लोभादिकका स्थल है । इस शिवका नाम भू है जिससे भवसागर स्थिर है । भव और भवानी दोनों इस भवसागरके सरदार हैं । प्रथम में लिख आया हूँ कि, उत्पत्तिके पूर्व महामाया तीनों भाइयोंको एक कौतुक दिखलाया कि, उन्होंने रक्तसे भरी हुई एक नदी देखा उसमें दुर्गन्धिसे भरा हुवा कूड़ा करकट देखा । इसे देखकर ब्रह्मा और विष्णु तो भाग गए परन्तु शिवजीने उसको चूतड़ोंके नीचे रखकर उसका आसन बना लिया । इस दुर्गन्धिमेंसे आदिभवानी निकल पड़ी वह शिवसे प्रसन्न हुई । शिवको अपना निजका किया । इस कारण भू और भवानी दोनों भवसागरके मूलही ठहरे । समस्त सौंसारिक वासनाएँ आपको भली जान पड़ीं । यह तमोगुण अज्ञानका मूल है । शिवजी क्रोधकी प्रतिमूर्ति हैं । जब तमोगुणी बुद्धि मनुष्यमें आती है तब समस्त कार्य सत्तोगुणके विरुद्ध करता है । तमोगुणी, मुक्ति एवं सत्तोगुणके विरुद्ध है । जब तमोगुण विजयी होता है तब मनुष्य भौति २ के दुष्कर्मों में फँसता है; उसका फल जो है सो संसारमें प्रगट है ॥
श्री कागभुसुण्डिकी उत्पत्ति ।
वसिष्ठ संहितामें अर्थवाद लिखा है कि, शिवजीके साथ अनेक स्त्रियाँ थीं वे समस्त देवियाँ कागके स्वरूपमें थीं । शिवजी विशेषतः पार्वतीजीसे प्रेमसंबंध जोड़ते हैं कारण यह कि, पार्वतीजी अत्यंत सुन्दरी तथा धर्मिष्ठा थीं । इस कारण अन्यान्य देवियाँ शिवजीसे विरुद्ध तथा पार्वतीजी को बँरिन होगईं । तब इनसबोंने आपसमें परामर्श करके एक दिवस पार्वतीजीको मार डाला । उनका सार पकाया