कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextजो कि, उनको देखकर आसक्त न हो जावे । वे कन्यायें उस स्थानपर इस कारण नियत की गई हैं कि, हंस कबीरको अपने जालमें फँसालें, जब वे हंस कबीरके निकट जाती हैं तब नाना प्रकारके हावभाव कटाक्षद्वारा उनको सौहित करना चाहती हैं । परन्तु वे उनकी ओर तनिकभी ध्यान न देते हुए कहते हैं कि, दूर हो चली जा ? तुम्हारी तनिक भी इच्छा हमको नहीं है । तब वे निराश होकर लौटती हैं । भला मकड़ीके जालमें भारी पदार्थ कैसे फँस सकते हैं । जब हंस उनको अनादर करके चलते हैं, तब आगे धर्मराय मिलते हैं दंडवत् प्रणाम करते हैं, पीछे हंस ऊपरकी ओर चले जाते हैं । जब सत्यलोकको पहुँचते हैं, तब सत्यलोकके हंस उनकी अगवानीके निमित्त बाहर निकलते हैं, प्रत्येक हंस अपने हृदयसे लगाता, मिलता और प्रसन्न होता है, कहता है कि, बहुत दिवसोंके पृथक् हुये हंस आज हमसे आकर मिले । सभी हंस मिलकर उनको सत्यपुरुषके पास ले जाते हैं वे हंस सत्यपुरुषका दर्शनपा दंडवत् प्रणाम करके कृतार्थ हो लोकमें वास करते हैं ।
शोर' ।
भुर्गू रूह आखिरीं नफसको । जब छोडे इस उनसरी कसफको ॥
सतलोग सिधार साथ सतसाज । उस वक्त करे बुलन्द परवाज ॥
दर सिम्त शुमाल सर बसर जाय । बासुरअत सो उबूर कर जाय ॥
वह नूरो जलाल बेबयों है । गुप्ततारे कबीरमें आयों है ॥
जब सुकृत लोक रखरवों हो । रागोरंग देखते दवों हो ॥
देखे कहीं सज्जः लाल जारों । बाहुस्नो जमाल गुलअजारों ॥
सदहा गुलशन चमनबहारी । शीरीं नहरेँ पुर आब जारी ॥
गहे बर्क बदन है नाजनीनाँ । है खूब लगी बजारे मीनाँ ॥
है फिरते कहीं ये हूरो गिलमाँ । बैठे कहीं जाहिदो मुसलमाँ ॥
सैकड़ों प्रकारकी बस्तियाँ और सृष्टिकी रचना देखते हुए ऊपरको चलते हैं । स्वर्ग तथा वैकुण्ठकी सैर करते हुए समस्त बस्तियों और शून्यको पार करके पीछे सत्यलोकको पहुँच जाते हैं ।
कबीर साहबकी मङ्गलवाणी ।
चल हंसा सतलोक हमारे, छोडो यह संसारा हो ॥
यहि संसार काल है राजा, कर्म को जाल पसारा हो ॥
चौदह खंड बसे वाके मुखमें, सबहीं को करत अहारा हो ।