कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextजारबार कोयला कर डारन, फिर फिर दे अवतारा हो ॥
ब्रह्मा विष्णू शिवतन धरिया, और को कौन बिचारा हो ।
सुर नर मुनि सब छलछल मारे, ले चौरासीमें डारा हो ॥
मध्य अकाश आप जहँ बैठे, ज्योति शब्द ठहियारा हो ।
ताका रूप कहाँ लग बरनो, अनंत भान उजियारा हो ॥
श्वेतस्वरूप शब्द जहां फूले, हंसा करत बिहारा हो ॥
कोटिन चांद सुरज छिपि जहँ, एक रोम उजियारा हो ।
वही पार इक नगर बसत है, बरसत अमृतधारा हो ॥
कहे कबीर सुनो धर्मदासा, लखो पुरुष दरबारा हो ॥
इस सत्यलोककी मनोहरता और हंसोंका रहन सहन और रीति व्यवहार सूक्ष्मवैदके पढनेसे जाना जा सकता है ।
मुस'दस ।
यह हरदो जहां काल पुरुष के हैं इजारे ।
हर सिम्त व हर जाय में यम जाल पसारे ॥
यक लोक व यक वैद दो दरिया के किनारे ।
सैयाद के काबू में हैं सब जीव बेचारे ॥
चलती है यहां तेग व तलवार दो धारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥
जब भूल गया आदम को आपही आपा ।
पाबन्द हुवा तिफली जवानी व वृद्धापा ॥
सब पर है लगा मलिक मौत मोन्ह व छापा ।
है आग लगी बेशः जलेगा यह सरापा ॥
जलते हैं धोल उड़ते धुवें धार शरारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥२॥
अफसोस लिया लूट धरम धरमन धूरत ।
एक इश्क जदः भई है एक हुश्न है औरत ॥
हर कौन कियों भौन है यह मोहिनी मूरत ।
१—यह मुसदस कबीर साहब की मंगलवाणीके भावका विशद अनुवाद है "चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो—“चल हंस अचल मोलिदो आताद हमारे” यह अनुवाद है। “यहि संसार काल है राजा, कर्मको जाल पसारा हो—इसका “यह हरदो जहाँ” यहाँसे “तलवार दो धारे” यहाँतक अनुवाद है, पर कुछ भाव बढाकर किया है। इसी तरह प्रत्येक पावके भावका कल्पना के साथ अनुवाद किया है विस्तारके भयसे पूरा नहीं मिलाते।