Skip to content
SarvaKosh
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 335 of 1367

Read in context
Page 335

४३—जितने धर्म संसारमें प्रचलित हैं सबके आचार्य कबीर साहब हैं ऐसा कबीर पन्थियोंको ध्यान करना चाहिये, परन्तु उनके मुक्ति दाता तो स्वयम् (कबीर साहब) और चार गुरु तथा उनके वंशोकोही ठहराया गया है, दूसरेको नहीं कहा ।

४४—किसीको कभी शाप न देना, किसीसे कुवचन न बोलना, एवं किसीका अहित चिंतन न करना चाहिये ।

४५—परमात्माको सर्वत्र पूर्ण जानना । किसी प्राणीको भी दुःख देनेको ईश्वरको दुःख देनेको तुल्य जाने ।

४६—अभिमानी कभी परमात्माको ध्यापक नहीं देख सकता ।

४७—गुरुकी आज्ञाकारिताही परम तपस्या है ।

४८—जबतक शरीरसे लाड प्यार है उसके पोषणमें वृत्ति लगी हुई हैं इसमें आज्ञाकारिता असम्भव है ।

४९—मूर्ख, शठ तथा विद्याहीनको मुक्ति पद कभी नहीं मिलता ।

५०—जबतक शरीरका भय और चिंतन यानी देहाभिमान है तबतक विदेह पद कदापि प्राप्त नहीं हो सकता । जो स्वयम् विदेह हो विदेहको प्राप्त हो ।

कबीर साहबके लोक तथा हंसोंकी कथा ।

कबीर साहबका वह लोक है जिसके कि, गुण कहने सुननेसे बाहर है । केवल स्वसंवेदही थोडासा विवरण करता है । जिस समय उस लोकको हंस चलते हैं उस समयके उनके प्रतापका वर्णन कुछ किया नहीं जा सकता । भला उनके सौन्दर्यका बखान किससे हो सकता है जिनका कि एक एक बाल ऐसा देदीप्यमान् है, जिसके कि सामने करोड़ों सूर्य छिप जावें, उन हंसोंके मनमें तनिक भी वासना नहीं रहती । निरञ्जन, आद्या, ब्रह्मा, यम, शिव, ऋषि, मुनि इत्यादि वासनाकेही आधीन हो बारम्बार अवतृत होते हैं—राम कृष्ण सिद्ध साधु इत्यादि सब धर्मवासनासे अवतार लेते हैं ।

जिस समय कोई मनुष्य मरता है तब उत्तरकी ओर होकर चलकर प्रथम विष्णुको निकट अपने पाप पुण्यका लेखा देनेके निमित्त वैकुण्ठको जाता है । जब हंसकबीर चलते हैं तब सत्यगुरुके शब्दके लवद्द्वारा अपने पूर्ण बलसे ऊपरकी ओर चढे चले जाते हैं, ब्रह्माण्डके पार हुआ चाहते हैं, तब धर्मराजकी तीन-सौ साठ कन्या मिलती हैं, जिनके वस्त्र आभूषण और सौन्दर्य आदिका मैं क्या विवरण करूँ ? सत्यकबीरके अतिरिक्त ऐसा कोई भी तीनों लोकोंमें नहीं है