कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकबीर वचन ।
रामानन्द गुरुदिच्छा दीजे । गुरुदच्छिना हमसे लीजे ॥
रामानन्द वचन ।
सूद्रेके कान न लागा भाई । तीन लोकमें मोर बड़ाई ॥
जब रामानन्दजीने स्पष्ट उत्तर दे दिया कि, मैं दीक्षा नहीं दूंगा, तब कबीर साहब चुप चाप चले आये। स्वामीजीका यह नियम था कि, एकपहर रात रहताँ तब गंगास्नानको आया करते थे। कबीर साहबने वह समय ठीक कर लिया और जब स्वामी ी स्नान करने चले तब आप छोटे बालकका रूप धारण करके स्वामीजीके मार्गमें सीढ़ियोंपर सो गये। स्वामीजी खड़ाऊँ पहने चले आते थे। वहाँ आतेही आपकी खड़ाऊँ की ठोकर बालकके शिरमें लगी। तब बालक रोने लगा। जब लड़केको रोते देखा तब स्वामी जी खड़े हो गये, और बालकके शिरपर हाथ धरकर कहा कि, बत्स ! मत रों राम राम कहो। तब कबीर साहब शान्त हो गये और कहने लगे गुरुजी राम राम कहूँ ? स्वामीजीने कहा हों राम राम कहो, उस समयसे कबीर साहब बराबर राम राम कहने लगे और स्वामी रामानन्दजीसे गुरु शिष्यका संबंध जोड़ लिया। फिर प्रातःकाल कंठी धारण कर हाथमें तुलसीकी माला लेलिया और मस्तकपर तिलक लगाकर ठीक वैष्णव मूर्ति बना राम राम की धुन लगादी। कबीर साहबका यह रंग ढंग देखकर अनेक मनुष्य प्रश्न करने लगे, कबीर साहबजी ! आपने यह वेष्ट वैष्णवका किस कारण बनाया है ? तब वे सब लोगोंको उत्तर देने लगे कि, मैंने रामानन्द स्वामीको गुरु बनाया है। यह बात सुनतेही संन्यासी तथा वैरागियोंने स्वामीजीसे जाकर कहा कि, महाराज ! आपने ऐसी मर्यादा छोड़ दी कि, जोलाहेके पुत्रको शिष्य कर लिया, ऐसा आपको उचित नहीं था। यह बात सुनकर स्वामीजीने कहा कि, मैंने चेला नहीं किया, बुलाओ कबीरको। लोग गये और कबीर साहबको बुला लाये।
उनचासवों प्रकरण ।
स्वामी रामानन्द कबीर साहबको शिष्य स्वीकार करना ।
उस समय रामानन्द स्वामीका यह नियम था कि, वह किसीको देखते नहीं थे और कंदराके भीतर परदेमें रहा करते थे। कबीर साहबको लाकर लोगोंने परदेके बाहर खड़ा किया। परदेके भीतरसे स्वामीजी बोले कि, ऐ कबीर ! मैंने तुमको अपना चेला कब बनाया। तब कबीर साहबने उत्तर दिया