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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 302 of 1367

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Page 302

कि, स्वामीजी जब आप गंगा स्नान को जाते थे, और मैं पथमें पड़ा था, आपके खड़ाऊँ की ठोकर मेरे माथेमें लगी मैं रुदन करने लगा । तब आपने कहा राम राम कह; उस समयसे मैं राम राम कहने लगा । तब स्वामीजीने कहा कि, हों ! एक बालक था जिसको मेरे खड़ाऊँ की ठोकर लगी और उससे मैंने राम राम कहा था । तब कबीर साहबने कहा कि गुरुजी वह लड़का मैं ही था । स्वामी जीने कहा कि, क्या इस प्रकार कोई गुरु चेला हो सकता है ? कबीर साहबने कहा कि, गुरुजी वेदशास्त्रमें रामनामसे बढ़कर और दूसरा क्या है ? तब स्वामीने उत्तर दिया कि, सबसे बढ़कर यही है, इससे बढ़कर और कुछ नहीं है । कबीर साहबने कहा कि, जो नाम सबसे बढ़कर है, सो तो आपने मेरे माथेपर हाथ धरकर देही दिया, फिर गुरु और शिष्य किस प्रकार होता है । कबीर साहबने स्वामीजीको अपनी बातोंसे निरुत्तर कर दिया । तब स्वामीजी बोले कि, जिस बालकसे मैंने राम नाम कहा था वह छोटा था और तू तो बड़ा जान पड़ता है । उस समय कबीर साहब वैसाही छोटा बालक बनकर, स्वामीजीकी गुफाके भीतर घुस गये और उनके चरणोंपर गिरकर कहने लगे कि, मैं उस समय ऐसाही छोटा था न ! यह कौतुक देखकर लोगोंको अत्यंत आश्चर्य हुआ कि, देखो यह बालक कौसा छोटा हो गया । तब अनन्तानन्दजीने, जो रामानन्द-स्वामीके बड़े चेले थे, समझाया कि, गुरुजी आप कबीरको मनुष्यका बालक न समझो, यह सिद्धका अवतार है, आप इससे किसी प्रकारका भेद मत करो । उस समय से स्वामीजीने कबीर साहबसे परदा छोड़ दिया और अपने शिष्योंमें मिला लिया । स्वामीजीके जितने शिष्य थे सब कबीर साहबको गुरुके समान मानते और अत्यंत मर्यादा तथा प्रतिष्ठा किया करते थे । स्वयम् कबीर साहब भी सबसे नितान्तही नम्रता पूर्वक मिलते थे, आपके गुरु भाई आपके आज्ञा कारी थे, आपका बड़ा ध्यान रखते थे, यों स्वामी रामानन्द स्वामीके चौदहसौ चौरासी शिष्योंमें सबके सरदार कबीर साहब बने ।

फिर समय २ पर कबीर साहब और रामानन्द स्वामीमें ज्ञान और मुक्तिके विषयमें विवाद हुआ करता था । रामानन्द स्वामी तथा कबीर साहब की वार्तालाप बहुत है जिसकी इच्छा हो दूँढ कर देखलें, कबीर साहबने स्वामीजी को अनेक कौतुक दिखलाए, सो भिन्न २ ग्रंथोंमें लिखे हैं ।


कबीरसाहब और स्वामी रामानन्दजीकी गोष्ठी ।
(वृहतक० सौ०)