कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextसंसारी जीव सहजही उनकी ओर आकर्षित होते। और जो कबीर साहबके पास जाता सो आपके उपदेशको ग्रहण कर पाखण्डको छोड देता। यह देखकर विचार करते २ उन्हें और तो कोई उपाय नहीं सूझा, किन्तु उनमेंसे जब कोई कबीर साहबके निकट आता तब लोगोंकी भीड़ देखकर यह कहता, कि, भाइयो ! तुम इस दुधमुहे बालककी बातोंमें क्या लगे हो ! विचारने अबतक गुरुका भी मुख नहीं देखा है, जानते नहीं हो ? शुक्रदेव जैसे तपस्वी और त्यागी ज्ञानी महात्मा बिना गुरु किये स्वर्गमें नहीं जाने पाये। तब इस निगुरे बालककी बातोंको सुननेसे तुम्हारा क्या भला होगा ?
यह सुनकर कबीर साहबने विचार किया “यद्यपि मुझे गुरु करनेकी आवश्यकता नहीं है, तथापि भक्तिकी मर्यादा स्थापित करने और सत्य धर्मके प्रचारके लिये मैं संसारमें आया हूँ, इसलिये गुरु करना उचित है। दूसरे आजकलके सबसे बड़े गुरु स्वामी रामानन्दजी संसारी भावनाओंमें पड़कर सत्य-मार्गसे भ्रष्ट हो रहे हैं। सो वह शिष्य बनकर मेरा उपदेश तो सुनेंगेही नहीं, मैं ही उनका शिष्य बनकर उनको मार्गपर लाऊँ तो ठीक है।” किन्तु, रामानन्द स्वामी तो वर्णाश्रमके फन्देमें ऐसे पड़े थे कि, द्विजोंके सिवाय किसीका मुख भी नहीं देखते थे। फिर मुसलमान करके प्रसिद्ध बालक कबीरको वह अपना शिष्य कैसे बनाते ? इसलिये कबीर साहबने यह युक्ति निकाली। जो आगेके प्रकरणमें वर्णित है।
अङ्गतालीसवाँ प्रकरण ।
कबीरसाहबका रामानन्द स्वामी वैष्णवके पास जाना और दीक्षा देनेका निवेदन करना और स्वामीजीका दीक्षा देनेसे इनकार करना तब कबीर साहबका एक छोटा लडका होकर रामानन्दके पथमें पड़ना, स्वामीजीके खड़ाऊँकी ठोकर कबीर साहबको लगने और चेलाका संबंध बनानेका वृत्तान्त ।
कबीर साहबका जब पाँच वर्षका वय हुआ तब आपने रामानन्द स्वामीके पास समाचार भेजा कि, स्वामीजी ! मुझको दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाइये और मुझसे गुरुदक्षिणा लीजिए। यह बात सुनकर स्वामीजीने उत्तर भेजा कि, मैं शूद्रको दीक्षा नहीं देता। देखो रामानन्द और कबीर गोष्ठी ज्ञानतिलकमें—