कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextअडसठवाँ प्रकरण
ब्रह्माका पंथ ।
दूसरे ब्रह्माजीका पंथ यह है कि, जिसके द्वारा ब्राह्मणलोग यज्ञ और दान पुण्य हवन इत्यादि कराते हैं। अद्याके शापसे ब्रह्माकी पूजा तो कोई नहीं करता, केवल मीमांसाधर्म और यज्ञ इत्यादि ब्राह्मणोंद्वारा अभी कहीं २ होता है।
विष्णु और शिवका पंथ ।
चौथे और पाँचमें विष्णु और शिव हैं, इन दोनोंकी पूजा का प्रचार संसारमें सबसे अधिक प्रचलित है, कबीर साहबका वचन है कि, केवल दो सम्प्रदाय इस संसारमें हैं एक विष्णुसम्प्रदाय तथा दूसरा शिवसम्प्रदाय ।
उनहत्तरवाँ प्रकरण
विष्णुका पंथ ।
जितने धर्म विष्णुके हैं, इनमें चार सम्प्रदायके वैष्णव विशेष सत्त्वगुण धर्मवाले लोग हैं और यही लोग वैष्णव हैं, इन चारों सम्प्रदायमें हिंसा आदि दुराचार नहीं है। यद्यपि ये लोग ठाकुरकी पूजा करते हैं, पर इनकी चाल पूर्णतया सत्त्वगुणियोंकी ऐसी है। इसी सत्त्वगुणी चालसेही मुक्तिद्वार खुल जाता है। इन चार सम्प्रदायोंके वैष्णव सब रामकृष्णआदिकी पूजा करते हैं और ठाकुरको पूजते हैं। ऐसा करते करते जब उनको बड़ा ठाकुर मिल जाता है तब उनका बेंडा पार कर देता है।
रजोगुण ब्रह्मा यह सांसारिक है, सतोगुण विष्णु भक्ति तथा मुक्तिकी राहपर चढ़ानेवाला है और तमोगुण शिव बन्धनका कारण है। विष्णुके जितने धर्म संसारमें हैं सबमें ये चारों सम्प्रदायके लोग उत्कृष्ट हैं। उनका परिणाम भी भला है, क्योंकि अन्त सबके सब सत्यपुरुषकी ओर ध्यान दिला देते हैं, इस कारण में चारों सम्प्रदायके वैष्णवोंके धामक्षेत्र लिखकर इनके गुण प्रगट करता हूं, चारों सम्प्रदायका सविस्तार विवरण में ग्रन्थ 'कबीरभानुप्रकाशमें' देकर आया हूं। यहां लिखनेकी कोई आवश्यकता नहीं केवल धामक्षेत्र लिखता हूं।
प्रथम श्रीसम्प्रदायके धामक्षेत्रका वृत्तान्त ।
अयोध्या धर्मशाला, चित्रकोट सुखविलास, गोदावरी प्रदक्षिणा, क्षेत्रधङ्ग तीर्थ, रामनाथधाम, अच्युतगोत्र, शुक्लवर्ण, सीता इष्ट, जानकी मंत्र, रामोपासना मंत्र, राघवानन्द महाप्रसाद, अनन्तशाखा, सामीप्य मुक्ति, श्रवण द्वारा, लक्ष्मी