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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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और फेन सब एकही स्थानसे बहता चला आता था, अभी तक वह तीनों भाइयों के समीप पहुँची नहीं थी कि, उसमेंसे महा दुर्गन्धि आने लगी । वह बदबू जब उन तक पहुँची तब पहले विष्णु उठकर भाग गये, उनसे वह दुर्गन्धि सहन नहीं की जा सकी । ब्रह्मा और शिव बैठे रहे । जब वह दुर्गन्धि कुछ और समीप आयी तब ब्रह्मा भी उठकर भाग गये और शिव चित्तको दृढ़करके बैठे रहे । जब वह दुर्गन्धि शिवके अत्यंत समीप आगयी तब शिवजी उसको पकड़ अपने चूतड़ोंके नीचे रख अपना आसन बना उसीपर बैठ गये । यद्यपि उसमें बड़ी असह्य दुर्गन्धि थी, तथापि शिवजीने उससे तनिक भी घृणा नहीं की, वरन उसको अपना आसन बना लिया । तब उसमेंसे अच्छा प्रगट होगयी और शिवजीसे कहा कि, मैं अब सदैव तेरे साथ रहूँगी। क्योंकि, मैं तुझसे अत्यंत प्रसन्न हुई, अब तुझको अपना पति बनाऊँगी । तब शिवजीने कहा कि, तू मेरे दोनों भाइयोंकी पत्नी हो और उनको अपना पति बना । तब अद्याने उत्तर दिया कि, मैं अपना दो रूप और भी बनाकर उन दोनोंके साथ भी रहूँगी, पर मेरी विशेषता तेरे साथ है और तू मेरा विशेष पति हुआ । फिर अच्छा अपना तीन रूप—महालक्ष्मी, महासरस्वती, महाकाली बनाकर अपने तीनों पुत्रोंके साथ रही और समस्त संसारकी रचना की । अच्छा विशेषतः शिवजीके साथ रहती है, शैव लोगही इस भवानीके धर्मके अगुआ हैं अर्थात् सन्यासी तथा योगी इत्यादि देवीधर्मके प्रचारक हैं ।

गोरखनाथ, मोहम्मद साहब और शंकराचार्य इत्यादि सब शिवजीके अवतार हैं और जितने धर्म इस अच्छाके हैं सब नितान्तही घृणित और बुरे आचरणोंसे भरे हुए हैं । बारह पन्थ तो इस अच्छाके प्रगट पृथ्वीपर प्रचलित हैं ही, उनके अतिरिक्त और भी कितनेही प्रकारकी पूजा देवीकी होती है, वह सब नितान्तही घृणित हैं और हिंसा दुर्गन्धि तथा भ्रष्टतासे भरी हुई हैं । जो कोई शिवके समान बलिष्ठ हो वह इन घृणित बातोंको स्वीकार करे और दूसरेकी सामर्थ्य नहीं है ।

संस्कृतमें भी नाम शिवजीका है और भो नाम श्रमका भी है, और भो नाम भग अर्थात् स्त्रियोंकी योनििका भी है । भवानी नाम अच्छाका भी कहा जाता है, भवानी दो शब्दोंके संयोगसे बना है, भो और आनी, आनी कहिये खान, अर्थात् भोकी खान । इसी प्रकार भो नाम उत्पत्तिका है सो भो और भवानी इस भवसागर के सरदार हैं । अर्थात् जो कोई भो और भवानीकी पूजा करे सो भवसागरके पार कभी जा न सके । यही भो और भवानी, महाकाल और महाकाली हैं । येही दोनों समस्त संसारके बंधनके निमित्त हैं, ये दोनों शिव और शक्ति एकही रूप हैं, शिव शक्तिके पन्थ सदा मिले मिलाये रहते हैं ।