कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextवे लोग अपनीही बुद्धिमानी और युक्तिको यथार्थ जानते हैं उनको गुरुपर विश्वास नहीं आता, उनसे गुरुकी सेवा और आज्ञाकारिता नहीं हो सकती । वे किसीको अपना उपदेष्टा नहीं समझते, वरन् पुस्तकोंकोही अपना ज्ञानदाता मानते हैं । जो जड़ को अपना गुरु और पथदर्शक समझे वह ईश्वरीय ज्ञानका अधिकारी नहीं हो सकता, जिसका जो मन चाहे वैसा किताबोंका आशय समझकर अपने मनमें आनन्दित हुआ करे । कोई पुस्तक यह कहने नहीं आती कि, मेरा यह आशय है यह नहीं है । मुसलमानों किताबोंके अनुसार खुदाने लुकमानसे पूछा कि, राज्य पंगम्बरी और तत्वज्ञान ये पदार्थ हैं इनमेंसे जो तू एक पसन्द करे वह तेरेको मिले । लुकमानने कहा कि, मुझे तत्वज्ञान दीजिये । लुकमानको तत्वज्ञानही मिला संसारमें लुकमान हकीम प्रसिद्ध हुआ इसी प्रकार मुलेमान बादशाहने तत्वज्ञानही माँगा, वह दोनों संसारमें बड़े प्रसिद्ध तत्वज्ञानियोंमें हैं । संसारमें बहुतसे ऐसे नबी सिद्ध और महात्मा हुये हैं जो एक अक्षर भी नहीं जानते थे । जिस प्रकार बालक निरपराध दीन और निष्कपट होता है तो उसको सब कोई प्यार करते हैं, गोदमें लेते हैं, लोग जानते हैं कि, यह कुछ चालाकी नहीं जानता । बुद्धिमानोंके लिये उनकी बुद्धिमानी ही वश है ।
नजम ।
जो विल्लीको वह दे परवाजका जोर । तो ख़िलकतमें परिन्दोंके पड़े शोर ॥
न हीरालालसे खुश हाल है कोह । न है फरहत नहै उसको गम अन्दोह ॥
न गजमुक्तासे गजको शादमानी । गोहरसे बहरको क्या कामरानी ॥
गई ख्वाहिश गुजर सब दिलसे उनके । हैसीनः में दफीनः इल्म उनके ॥
नाम आदिन सीम और जर घरबादशाही । न हुकमा मुस्तहक इल्मे इलाही ॥
दिया हर एकको एक एक इल्म ओला । वहरफन् इल्म कामिल आप मौला ॥
दिया बखश उसने सामान अजिजोंको । कि, जाहिर देख उनसे मअजिजोंको ॥
न मुहिरिम और न पाये खास वस्तु । जो सुकरातीस अफला तू अरस्तु ॥
वह उम्मी वन्दःको पोशिश पन्हावे । कि, ख्वाँदा होवे दरमाँदा न पावै ॥
१५ प्रश्न—भ्रमको मुक्तिमार्ग जाननेका कारण—यह कौसा बड़ा आश्चर्य है कि, सब मनुष्य अन्धे हो रहे हैं, किसीकी बुद्धि काम नहीं करती ऐसा आवरण पड़ गया है कि, कोई भी नहीं सँभल सकता, जो अनित्य और भ्रम है उसेही मुक्तिमार्ग समझते हैं, सत्यसे सब भागते हैं, इसका क्या कारण है ?
उत्तर—क्या तुम नहीं जानते कि, जिस समय चिड़ीमार मोहिनी मन्त्र पढ़ता है, गीत गाता है तब जङ्गल भरके पशु पक्षि आदि सब मोहित हो जाते