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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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हैं स्वयं उसके जालमें आकर फँस जाते हैं वह सबको भून कर खा जाता है। इसी प्रकार दीपक पर पतङ्गें आकर गिरते हैं जल भुनकर नष्ट हो जाते हैं, उनको क्या सुख मिलता है ? इसी प्रकार मनुष्यकी बुद्धि काल पुरुषने अपनी मायासे भ्रष्ट कर दी। सब अन्धे हो गये हैं, सत्य पदको छोड़ मायाकी पूजामें लगे हैं। सत्यपदसे भागते हुए द्वेष करते हैं। सबकी परीक्षा कर देखो, जिसके धर्मका अवगुण दिखलावोगे वहाँ लड़ाई करनेको तैयार होगा, कोई ऐसा न कहेगा कि, "तुम मुझको सत्यमार्ग वतलाते हो, भ्रमसे हटाते हो, आवरण दूर करते हो मिथ्या भ्रमको छुड़ाते हो।" मायाका आवरण सबके ज्ञानपर पड़ा हुआ है, उसने ब्रह्मा, विष्णु, शिव और नारद आदि बड़े २ समर्थोंको भी नहीं छोड़ा, सबको मोहितकर अचेतकर दिया, फिर दूसरोंकी क्या सामर्थ्य है कि, उससे जीत सके। सब जीवधारियोंको मायाने अपने हाथमें कर रखा है, कोई भी कुछ कहे वो कर नहीं सकता। मेरी क्या सामर्थ्य थी कि, मायाका हाल लिखनेको लेखनी उठाता। कलम कहीं, कागद और स्याही कहीं कहीं चले जाते, केवल सर्वशक्तिमान् सद्-गुरु कबीर बन्दीछोरकी कृपा है कि, लिख रहा हूँ, नहीं तो यह भेद खोल डालनेकी कसीकी भी शक्ति नहीं है। साधु लोग समझकर मौन धारण करते हैं।

१६ प्रश्न—जीवका ईश्वरसे मिलना, ब्रह्म, क्यों कर पहचानाजा सकता है ? मायाका आवरण किस प्रकार छूटे ? जीव ईश्वरसे कैसे मिले ?

उत्तर—जब भक्ति और भजन करते २ अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है तब क्रमशः ज्ञानका प्रकाश होने लगता है। क्योंकि, अन्तःकरण अशुद्ध होनेके कारण ज्ञान नहीं होता जबतक शुद्ध ज्ञान नहीं होता तबतक सत्य नहीं जाना जाता। परमात्मा सर्व व्यापी है कोई स्थान कोई पदार्थ उससे भिन्न नहीं, जब तक असम्यक् दृष्टि है तब तक सम्यक् परमात्माका दर्शन (ज्ञान) असम्भव है। जिसने सत्यक् ज्ञान प्राप्त कर लिया वह सब कुछ परमात्मामें देखता है एवं परमात्माको सबमें देखता है।

१७ प्रश्न—सन्नाधर्म, समस्त मनुष्योंका सामान्य और एक यथार्थ धर्म क्या है ?

उत्तर—समस्त मनुष्योंका यथार्थ और सामान्यधर्म वही है जिससे आवागमन छूट जावे। जिससे अपना यथार्थ स्वरूप प्राप्त हो जावे जिससे अपने मूलको पाजावे। इस धर्मके गुरु कबीर साहब हैं। शास्त्र स्वसम्बेद है ज्ञान शारशब्द है।