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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 1274 of 1367

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१२ प्रश्न—मायासे पार होनेका कारण—समस्त संसार विष्णुका नाम जपता है, तो विष्णु स्थान स्थानपर धोखे कपट और छलके कार्य किया करते हैं। ईश्वर विरुद्ध उनके काम देखनेमें आते हैं, तो भी लोग उनको ईश्वर मानते हैं इसका क्या कारण है ?

उत्तर—हो, निस्सन्देह समस्त संसार विष्णुकाही नाम जपता है, विष्णु-कोही भक्ति करता है। इसका कारण यही है कि, यह संसार माया है, जगत्का कारण मायाही है। विष्णु मायापति है, स्वयं माया है। किसीकी सामर्थ्य नहीं कि, विष्णुकी मायाको पारकर सके, वह बड़ा शक्तिमान है, उसीकी मायामें पड़े हुये बड़े २ सिद्ध साधु महात्मा गोते खाते हैं संसारको जिस शक्तिने बनाया है वही अनादि प्रकृति है, वही समस्त संसारपर ईश्वरता करती है, कोई ऐसा प्रबल नहीं कि, इसे जय करे इसके बन्धनोंको तोड़कर पार जासके। यह सब छल कपट लील मरना मारना सुख दुख राज वैभव, देना लेना, सब मायाहीके काम हैं। अतः विष्णुने जो कुछ किया वह मायाके अविरुद्ध, किया। तीनों देव माया ही रूप हैं इन तीनोंमें श्रेष्ठ विष्णु हैं। यदि वे ऐसी लीला न करें तो मायाके गुण नष्ट हो जावें। विष्णु भगवानपर दोषारोपण करे वह अज्ञानी और पापी है। सर्व मनुष्य मायाहीकी भक्ति और भजन करते हैं, मायाही उनको फल देती है, मायाहीमें तीनों लोकका पसारा है। मायाही कर्ता धर्ता है। मायाहीने सबको मोहमें फँसा लिया, सर्व जगत् और ईश्वर मायाही है। जो विषयवासनाके अधीन है वे सब मायाके तुच्छ सेवकोंमें है।

१३ प्रश्न—मायाके पार जानेके लिये क्या न्याय करना चाहिये ?

उत्तर—मायाके पार जानेके वास्ते कबीर साहबकी शरण और आदेश है दूसरी कोई युक्ति नहीं है। जब कि, शिव और गोरख ऐसे योगी मायामें पड़े चक्कर खा रहे हैं तो दूसरेकी क्या कहनी है।

१४—प्रश्न—पन्थ प्रचलित होनेका कारण—बड़े २ विद्वान ज्ञानी और पण्डित संसारमें हुये पर किसीका धर्म (महजब) पृथिवीमें प्रचलित नहीं हुआ। बरन् जो लोग विशेष विद्या नहीं पढ़े थे उन्हींका धर्म संसारमें प्रगट प्रचलित हुआ, इसका क्या कारण है ?

उत्तर—इसका कारण यही है कि, जो लोग अपनी बुद्धिमानीका फल पा चुके उनको दूसरी सिद्धि और चमत्कार आदि प्राप्त नहीं होते क्यों कि, वे लोग अपनी पूर्णताके ऊपर अभिमान रखते हैं। ईश्वरी ज्ञानके लिये दीनता और नम्रताकी आवश्यकता है। यह गुण विद्याभिमानियोंमें कम होता है।