कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकहा कि तू, तो हाथोंसे पकड़ता है, मैं इन छुरियोंको दांतोंसे पकड़ सकता हूँ । बाजीगरने कहा तू अपनी कला प्रगट दिखला. उस चरवाहेने एक छुरीको लेकर इस प्रकारसे फँकना और दांतोंसे पकड़ना आरम्भ किया कि, जब वह छुरी फँकता तब नीचे आते आते उसकी मूठही दांतपर आके गिरती. चरवाहेकी यह लीला देख लोगोंको बहुत आश्चर्य हुआ । बाजीगरने चरवाहेसे पूछा कि, तूने यह विद्या कहाँसे सीखी ? उसने कहा मैंने किसीसे सीखी नहीं बरन् स्वयं मुझे आगई है । बाजीगरने बहुत प्रकारसे पूछा पर उसने गुरु स्वीकार नहीं किया, तब बाजीगरने कहा जब तू गुरु स्वीकार नहीं करता तो अच्छा फिर तू यही कौतुक दिखला उस चरवाहेने फिर कौतुक दिखलाना चाहा पर अबकी बार मूठके बलसे गिरनेके बदले छुरी नोकके बल गिरी जो गिरतेही कण्ठके अन्दर घुस गई । वह मरने लगा उस बाजीगरने उससे फिर पूछा कि, अब भी तू कहदे तूने यह विद्या कहाँसे सीखी ? । चरवाहेने उस अवस्थामें स्वीकार किया कि, मैंने बगुलेको देखा था कि मछलियोंको ऊपर फँकता उनके नीचे आते आते मुँहमें निगल जाता. मैंनेभी वैसेही अभ्यास करना आरंभ कर दिया बाजीगरने कहा तेरा गुरु तो अवश्य था, तूने इनकार क्यों किया ? गुरुसे विमुख होनेका यही फल है अब तेरी मृत्यु आगई । थोड़ी देरमें वह चरवाहा मर गया ।
निष्कर्ष—भली प्रकार स्मरण रखना चाहिये कि, गुरु विमुखजन कभी सफलता नहीं पावेंगे और गुरुमुख गुरुकी सेवा और भक्ति करके अपनी मनो कामना सिद्ध कर लेते हैं, उनका प्रभाव बढ़ता है, सब प्रकारकी कला कौशल और विद्या प्राप्त होती है । इसीपर एक कथा है ।
द्रोणाचार्य और भील—एक समय पांडव और कौरवोंके बाण विद्याके गुरुद्रोणाचार्यके पास एक भीलने आकर कहा कि, मुझे बाण विद्या सिखलावो । द्रोणाचार्यने उत्तर दिया मैं तुझे बाण विद्या नहीं सिखलाऊँगा, तू भील है, इस विद्याको सीखकर बहुत अत्याचार और हिंसा करेगा । वह निराश होकर चला गया, बनमें पहुँचकर उसने द्रोणाचार्यकी एक मूर्ति स्थापित करके बड़े प्रतिष्ठा श्रद्धाके साथ उसीके सन्मुख अभ्यास करना आरम्भ किया । बड़ी प्रेम भक्तिसे नित्य प्रति मूर्तिको नमस्कार करता पूजन करके अभ्यास आरम्भ करता । थोड़ेही दिनोंमें उसने अपने अभीष्ट को सिद्ध कर लिया बाण विद्यामें ऐसा प्रवीण हुआ कि अर्जुनने भी उसकी प्रशंसा की । गुरुकी मिट्टीकी ही मूर्तिमें पूर्ण विश्वास होना, चाहिये । जबतक गुरुमें पूरा विश्वास न हो तबतक कदापि सफलता नहीं होती । गुरु कँसाही क्यों न हो शिष्य अपनी दृढ़ताके कारण उच्च पदको प्राप्त करेगा ।