कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextव्यापक देखनेवाला हो, ४—चलेको ईश्वरसे मिलाने, भक्तिमें लगा देने और उसकी शङ्काओंके दूर करनेकी शक्ति रखता हो।
जिसके अन्तःकरणमें विषय वासनासे उपरामता आगई हो, अपने मनको वश कर लिया हो, सब जीवोंके कल्याणकी चिन्ता हो, परोपकारी हो, वेद शास्त्रके आशयको खूब समझता हो, दूसरोंको समझा सकता हो वही गुरु-पदका अधिकारी है। ऐसे विद्वान्, सत्य असत्यको भलीप्रकार समझते हैं, अपने स्वरूपके ज्ञानको संशय रहित धारण करते हैं। वे जानते हैं कि, समस्त संसार मेराही रूप है, दूसरा कोई नहीं है। आत्मा को छोड़ कभी उनके हँत दृष्टि नहीं होती, सब मनुष्योंको सत्य पुरुषकी भक्ति और प्रेममें दृढ़ कराते हैं। श्रद्धा, भक्ति प्रेम, शौर्य, आदि देवी गुणोंके स्वरूपही होते हैं धन्य है वे पुरुष जिनको ऐसे गुरु मिलते हैं।
गुरु शब्दका अर्थ।
दोहा— गु आधियारे जानिये, रु कहिये परकाश।
मिटि अज्ञानहि ज्ञानदे, गुरु नाम है तामु॥
अर्थ—गु-शब्दका अर्थ है अन्धकार—अर्थात् अज्ञान। रु—का अर्थ है प्रकाश अर्थात् ज्ञान। तात्पर्य यह कि, अन्धकार रूप अज्ञानको नष्ट करके हृदयमें ज्ञानरूप प्रकाशको प्रगट करे वो गुरु कहलाता है गुरुके सब गुणोंमें श्रेष्ठ गुण शिष्यको ईश्वरपरायण कर देता है।
चलेके लक्षण—इसी प्रकार हैं। १ अहङ्कारका त्याग कर देना, २ विषय वासनासे रहित होना, ३—तन मन धनसे गुरुकी सेवा करना, ४—गुरुके वचन पर पूर्ण श्रद्धा विश्वास रखना इन चारों गुणोंमें दो गुण गुरुकी सेवा और गुरुपर विश्वास अत्यावश्यक है। जिसमें यह दो गुण हों उसमें शेषके दो गुण और भी आजावेंगे। गुरुकी सेवा और गुरुका विश्वास येही दो गुण भक्ति और मुक्तिके चिह्न हैं। यदि ये दो गुण न हों तो शिष्य अवश्य कालके गालमें जावे एवं उनका आवागमनसे छूटना दुर्लभ होवे।
सर्व कालमें गुरुकी स्तुति करना उचित है। गुरुसे विमुखता नरकका मार्ग है। जो कोई गुरुके विमुख हुआ, उसका ज्ञान विचार सब नष्ट हो जाता है यह कालका आखेट हुआ है इसके ऊपर एक दृष्टान्त है।
बाजीगर और चरवाहा—किसी समय एक बाजीगर कहीं कौतुक दिखला रहा था। उसके मध्य उसने यह कौतुक दिखलाया कि, तीन छुरे परस्पर एकही समयमें ऊपरसे फँकता उसे हाथोंसे पकड़ता था। यह देखकर एक चरवाहेने