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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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इससे इधर उधर पूछते फिरने लगे पर सत्य धर्मका पता न लगा. क्योंकि, सच्चे उपदेशक तो सच्चे निष्कामी, देहाभिमान गलित पुरुष ही हुआ करते हैं। इधर उधर भटकनेमें जब कुछ प्राप्त न हुआ तो कोई २ (हिन्दू) ईसाई, मुसलमान, नास्तिक, नेचरियो, विधर्मी (ला सहजब) आदि होने लगे।

यह सब परिणाम हिन्दू साधुओंके धर्मकी ओर ध्यान न देनेकाही है। ईसाई पादरी लोग बेतन पाते हैं, जिससे दिनरात अपने धर्मकी उन्नतिमें लगे रहते हैं। उनके उलटा हिन्दू साधुओंको रोटी कपड़ा तथा अन्य आवश्यक पदार्थ बड़ी कठिनातासे मिलते हैं। जिसमें कुछ प्राप्त न हो वरन् दुःखही दुःख हो तो, स्वभाविकही बात है कि, उसमें कठिनातासे प्रवृत्ति होती है। हिन्दू साधु अपने शरीरयात्राके ही चिन्तामें दिनरात लगे रहते हैं तो धर्म अथवा देशकी उन्नति कैसे कर सकेंगे? ठीक इनके उलटा, पादरियोंको बेतन मिलता है जिससे वे अपनी आवश्यकतासे निश्चिन्न हो दिनरात धर्मकी उन्नतिमें ही अपना समय बिताते हैं।

धन्य है अंगरेजी सरकारको कि, जिनकी कृपासे व्यतीत मुसलमानी शासनकी अपेक्षा वर्तमानमें लोगोंको लिखने और कहनेकी स्वतन्त्रता है जो कोई कुछ लिखना और कहना चाहता है, लिख और कह सकता है। किसी प्रकार की रुकावट अथवा अत्याचार नहीं है।

अन्य २ राज्योंमें सच्चे धर्मज्ञों और सच्चे सन्तों पर जो जो अत्याचार और अन्याय हुआ करते थे वे अब नहीं हैं। अन्य राजाओंके शासन कालमें उनके धर्म और मजहबके विरुद्ध कोई अपने धर्मकी बात प्रगट नहीं कर सकता था।

साखी - कबीर-सांच कहूँ तो मारि हैं, तुरकानी का जोर।

बात कहूँ सत लोककी, कहिके पकड़े चोर ॥

जिस राज्यमें सन्तोंको गाजर मूलीके समान काट डालते थे उस समय संत सत्य भेद कैसे प्रगट कर सकते थे? अथवा क्या लिख सकते थे? उस समय कहते तो किससे? और लिखते तो किसके लिये? उस समय तो धर्मद्वेषकी अग्नि भड़क रही थी कि, कोई मुखसे खोल नहीं सकता था। कलमका तो कुछ बल ही नहीं था। बादशाह स्वयम् स्वतंत्र और धर्म द्वेषी थे, दूसरे पठित मूर्ख धर्मद्वेषियोंका भी इतना बल था कि, धर्मके नाम पर जिस प्रकार चाहते थे शासकोंके मनको फेर देते थे।

मुसलमानीधर्म।

कबीरपन्थीग्रन्थोंमें लिखा है कि, मुहम्मद महादेवका औतार है। महा-