कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 1184 of 1367
Read in contextवर्तमानमें हमारे देशके राजा ईसाई हैं। अङ्ग्रेजी सरकारका न्याय प्रशंसनीय है। प्रजा बहुत कृतज्ञ है। इनके राज्यमें किसी प्रकारका अत्याचार नहीं है सब शुभचिंतक हैं, अङ्ग्रेजी सरकारके शासनका ऐसा प्रभाव है कि, इनके भयसे इनके दोषको भी कोई प्रगट कर नहीं सकता विरक्तोंको उचित नहीं है कि, राजाके औगुणों पर और अत्याचारोंको उनसे प्रगट न करें, बरन उनकी भूल और भावी भयसे उन्हें सूचित करना ही सन्तोंका धर्म है जिससे जैसे शारीरिक अत्याचारसे जीवोंको छुड़ाते हैं वैसेही आत्मिक दुःखसे बचा सकें, सच्चे विरक्त सन्तोंका न होना आत्मिक अत्याचार है। जब सच्चे संतही न रहेंगे एवं विरक्त निष्काम उपदेशकही न रहेंगे तो आत्मिक उपदेश कौन करेगा ? सच्चा निष्कामी विरक्त, लोक एवं परलोककी कामनासे रहित परमार्थी सन्तोंके बिना सत्य उपदेश कौन दे सकता है ? सत्य उपदेश नहीं तो ईश्वर कहाँ ? ईश्वर नहीं तो मनुष्यत्व कहाँ ? इस कारण शासकोंको उचित है कि, सच्चे निष्कामी सन्तोंकी ओर ध्यान दें। राजा और शासकोंको बेपरवाहीसे पठित मुखोंकी बन आई हैं वे साहसी बनकर सन्तोंकी निन्दा किया करते हैं।
विशेष कथन।
समस्त स्वसम्बदका यही सार है कि, संसारी मनुष्य सच्चे सन्तोंकी सेवा सच्चे मनसे करें जिससे सन्त अपनी शारीरिक चिन्ताओंसे निश्चित होकर भजनमें लगे रहें; जिससे दोनोंका परलोक सुधरे। सच्चे निष्कामी सन्तोंकी शरण गये बिना सांसारिक जीवोंका उद्धार होना कठिन है। संसारसे तरनेका एकमात्र उपाय सच्चे सन्तोंकी सङ्गतिही है।
सच्चे सन्तोंकी सेवा शुश्रूषा बिना देशका बड़ा अपकार हुआ है। लोग अंगरेजी फारसी पढ़कर अहंकारी हो गये हैं, सन्तोंकी सेवा छोड़ बैठे हैं, जिससे सत्य पथके दिखानेवाले सन्तोंका मिलना कठिन हो गया है। सत्योपदेशका मिलना कठिन हुआ तो लौकिक पारलौकिक मार्गोंको कौन बतावेगा, देश और धर्मकी रक्षा और उन्नति कैसे हो ?
जिनका विशेष धर्म, साधु सेवा था, वे अपने धर्मको छोड़ बैठे। धम छोड़ने से उदारता और भक्ति छूट गई, कृपणता अभक्ति फैल गई। विषय वासनामें प्रवृत्ति हुई, विरक्तों एवं सच्चे इन्द्रियजित, निष्काम उपदेशकोंसे घृणा हो गई, सत्य उपदेशका मार्ग बन्द हो गया, जिससे अन्तःकरण अशुद्ध अन्धकारमय हो गया, धम्मार्धम्मका विवेक जाता रहा, पर पूर्व संस्कारोंसे धर्मका नाम सुनकर धर्मकी खोज करने लगे। सच्चे सन्तों, विरक्तोंसे पहलेहीसे घृणा हो रही थी।